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ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय

Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished592 pages

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तीसरा अध्याय ] १३१ कुछ का कथन है कि पुरोडाश का जितना भाग बिना घी लगा हुआ हो उतना ही खाले, सोम पान की रक्षा के लिए। क्योंकि घृतरूपी वज्र से ही इन्द्र ने वृत्र को मारा। परन्तु यह माननीय नहीं। क्योंकि जो हवि है वह भी अग्नि में डाली जाती है और जो सोम-पान है वह भी अग्नि में छोड़ा जाता है। इस लिये पुरोडाश का जो भाग चाहे खाले। ये जो हवियां, आज्य, धान, करंभ, परिवाप, पुरोडाश, पयस्या आदि हैं वे यजमान के पास चारों ओर से आ जाते हैं, इसी प्रकार जो इस रहस्य को समझता है उसके पास यह चारों ओर से आ जाते हैं। (५) २४—जो हवियों के पंचक को समझता है वह इन पंचकों द्वारा समृद्धि को पाता है। यज्ञ की हवियों का पंचक यह है :— धान, करंभ, परिवाप, पुरोडाश, पयस्या। जो इस रहस्य को समझता है वह इन हवियों के पंचक द्वारा समृद्धि को पाता है। जो यज्ञ के अक्षरों के पंचक को समझता है वह अक्षरों के पंचक द्वारा यज्ञ से समृद्धि का लाभ करता है। यह अक्षर-पंचक यह है :—सु, मत्, पद्, वग्, दे। जो इस रहस्य को समझता है वह अक्षरों के पंचक द्वारा समृद्धि को लाभ करता है। जो यज्ञ के नराशंसपंचक को समझता है वह इसके द्वारा समृद्धि को पाता है। प्रातःसवन के दो नराशंस हैं। दोपहर के सवन के दो और तीसरे सवन का एक। यह नराशंस पंचक है। जो इस रहस्य को समझता है वह इसके द्वारा समृद्धि को लाभ करता है। जो यज्ञ के सवन पंचक को जानता है वह इसके द्वारा समृद्धि को प्राप्त करता है। यह सवन पंचक यह है :—सोम के पहले दिन का पशु-उपवसथ, तीन सवन, पशुरनुबंध्य। यह यज्ञ का सवन-पंचक है। जो इस रहस्य को समझता है वह सवन-पंचक द्वारा समृद्धि को लाभ करता है।