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ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय

Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished592 pages

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प्राक्कथन

बचपन में मैंने सुन रक्खा था कि ब्राह्मण ग्रन्थ वेदों की व्याख्या ( Commentaries ) हैं। व्याख्या का स्वरूप भी मेरे मस्तिष्क में वही था जो विद्यार्थी के मस्तिष्क में हुआ करता है। मैंने शेक्सपियर पर डाइटन्, वैरिटी आदि के नोट्स और कालि- दास पर मल्लिनाथ की टीकायें पढ़ी थीं। मैं समझता था कि इसी प्रकार की सहायता ब्राह्मण ग्रन्थ भी वेदों के सम्बन्ध में देते हैं। परन्तु जब मैंने ऋग्वेद के ऐतरेय ब्राह्मण और यजुर्वेद के शतपथ ब्राह्मण को पढ़ना आरम्भ किया तो मुझको बड़ा आश्चर्य हुआ। यह कैसी व्याख्यायें हैं, जिनसे मंत्रों का अर्थ समझने में कुछ भी सहायता नहीं मिलती : वस्तुतः व्याख्या पद के अर्थों में भेद है। आद्योपान्त पढ़ने और उन पर विचार करने के पश्चात् मैं इस परिणाम पर पहुँचा कि ब्राह्मण ग्रन्थ व्याख्या नहीं अपितु यज्ञ सम्बन्धी व्याख्या हैं। अर्थात् यदि आप चाहें कि उनके द्वारा वेद मंत्रों का अर्थ ज्ञात हो सके जैसे सायण, दयानन्द आदि आचार्यों के भाष्यों से होता है, तो आपकी इच्छा पूरी नहीं हो सकती। परन्तु यह पता चल सकता है कि किस किस मंत्र का किस प्रकार किस किस इष्टि या यज्ञ में विनियोग हुआ है। ऐतरेय ब्राह्मण में स्थान स्थान पर मंत्रों की रूप-समृद्धता का उल्लेख आता है— “एतद् वै यज्ञस्य समृद्धं यद् रूपसमृद्धं यत् कर्म क्रियमाणमृगभिवदति” (ऐ० १।१।४) अर्थात् यदि ऐसा मंत्र बोला जाय जिसमें उसी क्रिया का वर्णन हो जो यज्ञ में की जाने वाली हो तो इसको रूप-समृद्धता

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