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ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय

Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished592 pages

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१३६ [ दूसरी पञ्चिका "यह अच्छा है। यह बहुत अच्छा है। यहाँ अच्छा है, बहुत अच्छा है। मुझमें अच्छा है, बहुत अच्छा है। हे वाणी के रक्षक, मेरी वाणी की रक्षा कर।" होता सोम को ऐन्द्रवायवी ग्रह से पीता है। अब पढ़ता है :— "उपहूता वाक् सह प्राणेनोरमां वाक सह प्राणेन ह्वयतामुपहूता ऋषयो दैव्यास्तनू पावानेस्तन्वस्तपोजा उपमामृषयो दैव्यासो ह्वयं तां तनूपावानस्तन्वस्तपोजा" । "वाणी प्राण के साथ बुलाई गई। वाणी प्राण के साथ मुझे बुलावे, दिव्य ऋषि जो शरीरों की रक्षा करने वाले और तप से उत्पन्न हुये हैं, बुलाये गये। दिव्य ऋषि जो शरीर के रक्षक और तप से उत्पन्न हुये हैं मुझे बुलावें।" दिव्य शरीरों के रक्षक और तप से उत्पन्न हुये ऋषियों का अर्थ है प्राण। उन्हीं को वह बुलाता है। मित्र और वरुण के ग्रह से इस मन्त्र को पढ़ कर पीता है— "एष वसुविद्वद् वसुरिह वसुविद्वद् वसुर्मयि वसुविद्वद् वसुश्चक्षुष्पा- श्चक्षुर्मे पाहि" । "यह वसु है, ज्ञान वाला वसु है। यहाँ वसु है, ज्ञान वाला वसु है। मुझमें वसु है, ज्ञान वाला वसु है। हे आँख के रक्षक, मेरी आँख की रक्षा कर।" अब वह कहता है:— "उपहूतं चक्षुः सहमनसोपमां चक्षुः सहमनसाह्वयतामुपहूता ऋषयो दैव्यास्तनूपावानस्तन्वस्तपोजा उपमामृषयो दैव्यासो ह्वयतां तनूपावान- स्तन्वस्तपोजा" । "मन के साथ आँख बुलाई गई। आँख मुझे मन के साथ बुलावे। दिव्य तनूपा और तपोजा ऋषि बुलाये गये। दिव्य तनूपा और तपोजा ऋषि मुझे बुलावें"।