BharatKosha
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय

Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished592 pages

Page 176 of 592

Read in context
Page 176

१६२ [ तीसरी पञ्चिका वह मित्र और वरुण के लिये तीन मंत्र पढ़ता है । यह इस लिये कि कहते हैं कि जब आदमी बनता है तो पहले आंख बनती है। मित्र और वरुण के लिये मंत्र पढ़ कर वह मानों यजमान की आंख का संस्कार करता है । वह अश्विनों के तीन मंत्र पढ़ता है क्योंकि बच्चे के पैदा होने पर कहते हैं कि यह सुनने की इच्छा करता है। यह ध्यान दे रहा है। अश्विन के मंत्र पढ़कर वह यजमान के कानों का संस्कार करता है । इन्द्र के तीन मंत्र पढ़ता है क्योंकि उत्पन्न हुये बच्चे के विषय में कहा करते हैं कि यह पहले गर्दन उठाता है, फिर सिर । इन्द्र के मंत्र पढ़कर मानो वह यजमान में वीर्य्य का संस्कार करता है। विश्वेदेवों के तीन मंत्र पढ़ता है क्योंकि जब बच्चा पैदा होता है तो पीछे से हाथ पैर हिलाता है। अङ्ग विश्वेदेवों के हैं। इन मंत्रों को पढ़ कर मानो वह यजमान के अंगों का सस्कार करता है । वह सरस्वती के लिये तीन मंत्र पढ़ता है। क्योंकि जब बच्चा पैदा होता है तो वाणी सब से पीछे आती है। सरस्वती वाणी है। सरस्वती के तीन मंत्र बोलकर मानो वह यजमान में वाणी का संस्कार करता है । जो होता इस रहस्य को समझता है या जिस यजमान के लिये होता मंत्र पढ़ता है, वह एक बार उत्पन्न होने पर भी इन सब देवताओं, सब स्तुतियों, सब छन्दों, सब प्रउगों, सब सवनों द्वारा फिर नया जन्म पाता है। (२) ३—यह जो प्रउग शस्त्र है वह प्राणों के लिये है। सात देव के लिये मंत्र पढ़े जाते हैं। सिर में सात प्राण हैं। इनको पढ़कर मानो (होता यजमान के) सिर में सात प्राणों को रखता है।