BharatKosha
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय

Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished592 pages

Page 180 of 592

Read in context
Page 180

१६६ [ तीसरी पञ्चिका इस अनुवषट्कार से वह कृत्य को समाप्त कर देते हैं और सोम पान कर लेते हैं। यही सोम का स्विष्टकृत भाग है। अब वह वषट्कार करता है। (५) ६—यह जो वषट्कार है वह वज्र है। यदि उसका कोई शत्रु हो तो वषट्कार करते हुये उस शत्रु का ध्यान करले, बस वह वषट्कार वज्र के रूप में शत्रु का हनन कर देगा। वषट्कार में "षट्" (छः) शब्द आया है। छः ऋतुयें हैं। इस प्रकार वह ऋतुओं को बनाता और स्थापित करता है। जो ऋतुओं में स्थापित हो गया वह दूसरी चीज़ों में भी स्थापित हो जाता है। जो इस रहस्य को समझता है वह भली भांति स्थापित हो जाता है। वेद के पुत्र हिरण्यदन ने इस सम्बन्ध में यह कहा है :— वषट्कार में 'षट्' (छः) से होता इन छः चीज़ों को स्थापित करता है। द्यौ अंतरिक्ष में प्रतिष्ठित हैं। अंतरिक्ष पृथ्वी में। पृथिवी जलों में। जल सत्य में। सत्य ब्रह्म में। ब्रह्म तप में। यदि यह चीजें स्थापित हो गईं तो शेष सब कुछ स्थापित हो जाता है। जो इस रहस्य को समझता है वह भली भांति स्थापित हो जाता है। "वौषट्" का 'वौ' छः ऋतुओं का बोधक है। वषट्कार कहकर होता यजमान को ऋतुओं में भली भांति स्थापित करता है। जैसा वह देवों के साथ करता है वैसा देव उसके साथ करते हैं। (६) ७—वषट्कार तीन होते हैं। (१) वज्र (२) धामच्छद् (३) रिक्त। यह जो उच्चस्वर से और बल से वषट्कार करते हैं वह वज्र है। इससे वह जब चाहे तब अपने शत्रु और अहित- कारी को जिसको वह दबाना चाहे दबा सकता है। जिस यज-

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित) · Page 180 of 592 · BharatKosha