ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय
Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)
Page 182 of 592
Read in context१६८ [ तीसरी पञ्चिका नहीं चाहिये । जो इस रहस्य को समझता है वह प्रजा और पशु से युक्त होता है। (७) ८-वषट्कार करते समय जिस देवता के लिये आहुति दी जाय उसी का ध्यान करे । इस प्रकार साक्षात् देवता को प्रसन्न करता है, और उसके लिये प्रत्यञ्च रूप से याज्य मन्त्र पढ़ता है। वषट्कार ही वज्र है। इस वज्र को अगर बिना शांत किये फेंका जाय तो वह बिजली के समान हानिकारक होता है। इसको शांत करना सभी नहीं जानते, न उसकी प्रतिष्ठा को सभी जानते हैं। इसलिये जब बहुतों की मृत्यु होती हो तो वषट्कार के पश्चात् होता 'वागोजः' अनुमन्त्र बोलता है। इस प्रकार शांत होकर वषट्कार यजमान को हानि नहीं पहुँचाता। यजमान इस अनुमन्त्र को बोले :- “वषट्कार मा मां प्रमृक्षो माहंत्वां प्रमृक्षं बृहामनऽउपह्वये व्यानेते शरीरं प्रतिष्ठासि प्रतिष्ठां गच्छ प्रतिष्ठा मा गमय ।” “हे वषट्कार ! मुझे मत नष्ट कर । मैं तुझे नहीं नष्ट करूँगा। मैं तेरे मन को कोशिश कर के बुलाता हूँ । व्यान रूप से तू शरीर में प्रतिष्ठित है । प्रतिष्ठा को प्राप्त कर और मुझे प्रतिष्ठा को प्राप्त करा ।” कुछ लोग कहते हैं कि यह अनुमन्त्र बहुत बड़ा है और इसका कोई प्रभाव नहीं। इसके स्थान में “ओजः सह ओजः” ऐसा अनुमन्त्र वषट्कार के बाद बोलना चाहिये। ओज और सह वषट्कार के दो बड़े प्यारे शरीर हैं। इस प्रकार वह यज- मान को प्रियधाम प्राप्त कराता है। जो इस रहस्य को समझता है वह प्रिय धाम को प्राप्त होता है। वषट्कार वाणी है और प्राण और अपान है। जब वषट्- कार किया जाता है तो यह तीनों शरीर से बाहर निकलते हैं।