ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय
Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)
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Read in context१७८ [ तीसरी पञ्चिका के छः मंत्रों, बृहती के छः मंत्रों और त्रिष्टुभ् के तीन मंत्रों में गाया जाता है। इस प्रकार दोपहर के सवन के पवमान स्तोत्र में तीन छन्द और पंद्रह मंत्र होते हैं। यहां प्रश्न यह है कि यह तीन छन्दों वाला और पंद्रह मन्त्रों वाला दोपहर के सवन का पवमान अनुशस्त कैसे होता है ! इसका उत्तर यह है कि प्रतिपद् तृच् ( ऋ० ८।६८।१-३ ) की अन्तिम दो ऋचायें गायत्री छन्द में हैं ( पहली ऋचा अनुष्टुभ् में है ) और प्रतिपद् के पीछे के मंत्र भी गायत्री छन्द में हैं। इस प्रकार पवमान स्तोत्र के गायत्री मंत्र अनुशस्त हो जाते हैं। इन दोनों प्रगाथों द्वारा बृहती अनुशस्त होती हैं। इन बृहती मंत्रों को सामगान करने वाले रौरव और यौधा- जय स्वरों में तीन बार दोहरा कर पढ़ते हैं। इसलिये ये दो प्रगाथ स्तुति-शून्य होकर भी दोहरा कर पढ़े जाते हैं। इस प्रकार शस्त्र स्तोत्र के अनुकूल हो जाता है। दो धाय्य त्रिष्टुभ् में हैं और निविद् का सूक्त भी। इन मंत्रों से त्रिष्टुभ् अनुशस्त होते हैं। इस प्रकार जो इस रहस्य को समझता है उसके लिये तीन छंद और पंद्रह मंत्रों वाले पवमान अनुशस्त होते हैं। (६) १८—वह धाय्यों को पढ़ता है। प्रजापति ने धाय्यों के द्वारा इन लोकों में जिस जिस चीज़ की कामना की उसका पान किया ( अधयत् ) । इसी प्रकार जो यजमान इस रहस्य को समझता है वह इन धाय्यों के द्वारा जिस जिस कामना को करता है उसका इन लोकों में पान करता है ( धयति ) ( धय से धाय्य बना है ) । धाय्य क्या हैं ? जहाँ जहाँ देवों ने यज्ञ में छिद्र पाये वहां उनको धाय्यों से छिपा दिया। इस लिये उनको धाय्य कहते