ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय
Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)
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Read in context१९८ [ तीसरी पञ्चिका होता सोम के चरु को लेकर पहले अपनी ओर देखे, फिर सामगों की ओर। कुछ होता लोग पहले इस चरु को सामगों को अर्पण करते हैं। लेकिन ऐसा न करे। क्योंकि जो होता ‘वौषट्’ कहता है वह सब भत्तों का भक्षण करता है। ऐसा ऐतरेय ऋषि का कथन है। इसलिये “वौषट्” कहने वाले होता को पहले अपनी ओर देख लेना चाहिये। फिर वह उसे सामगों को अर्पण कर दे। (८) ३३—प्रजापति ने अपनी दुहिता से भोग करना चाहा। इसको कुछ 'द्यौ' कहते हैं और कुछ 'उषा' बताते हैं। उसने स्वयं रिश्य ( एक हिरन ) का रूप रख लिया। और दुहिता रोहित ( हिरनी ) बन गई। वह उसके पास गया। उसको देवों ने देखा और कहा, “अरे प्रजापति ‘-अकृत” काम करता है।” उन्होंने पूछा कि क्या कोई ऐसा है जो इस दोष की निवृत्ति कर दे। अपने लोगों में उनको इस काम के योग्य कोई न मिला। उनमें जो घोरतम अंश था उसको उन्होंने इकट्ठा किया। उनके इकट्ठा करने से एक देव पैदा हुआ जिसका नाम “भूतवान्” हुआ। जो इसके इस नाम को जानता है वही उत्पन्न होता है। देवों ने उससे कहा, “प्रजापति ने जो यह न करने योग्य काम किया है उस काम को बींध दे।” उसने ऐसा ही किया। फिर उसने कहा, “मैं एक वर माँगता हूं।” उन्होंने कहा, “माँग।” उसने पशुओं का आधिपत्य मांगा। इस लिये उसका नाम पशुमान पड़ा। जो उसके इस नाम को जानता है वह पशु वाला होता है। उस “भूतवान” ने प्रजापति के दुष्कर्म पर आक्रमण किया और उसको बींध दिया। वह बिंधा हुआ ऊपर उड़ गया। उसको मृग ( नक्षत्र ) कहते हैं। और जिसने मारा उसको मृग- व्याध। वह जो रोहित हिरनी ( प्रजापति की दुहिता ) थी वह रोहिणी हुई। यह जो बाण था जिसमें तीन फल (त्रि