ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय
Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)
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Read in context२०० [ तीसरी पञ्चिका “हे मरुतों के पिता, ऐसा न हो कि हम सूर्य के दर्शन न कर सकें। हे वीर रुद्र, ऐसा कर कि हम प्रजाओं से युक्त हो जायें अर्थात् हमारे सन्तान उत्पन्न हों।” “अभि नो वीरो अर्वति क्षमेत” के स्थान में “त्वं नो वीरो अर्वति क्षमेथा” पढ़ना चाहिये। यदि “अभि” न कहेगा तो यह देवता प्रजा के विरुद्ध (अभि) न होगा। “रुद्र” के स्थान में 'रुद्रिय' कहना चाहिये जिससे इस नाम का भयानकपन न रहे। यदि इसको हानिकारक समझे तो केवल नीचे का मन्त्र पढ़ दे :— शं नः करत्यर्वते सुगं मेषाय मेष्ये । नृभ्यो नारिभ्यो गवे ॥ (ऋ० १।४३।६) यह मंत्र 'शं' से आरम्भ होता है और कल्याणकारक है। 'नृभ्यो' का अर्थ है “पुरुषों के लिये” “नारिभ्यो” से स्त्रियों से तात्पर्य है। यह सब के कल्याण के लिये हैं। यह रुद्र का मंत्र है परन्तु अनिरुक्त है अर्थात् इसमें रुद्र का नाम नहीं आया। इसलिये यह सौ वर्ष की आयु का दाता है। जो इस रहस्य को समझता है वह सौ वर्ष की आयु प्राप्त करता है। यह मंत्र गायत्री छन्द में है। गायत्री ब्राह्मण है। इस प्रकार वह ब्राह्मण द्वारा रुद्र की उपासना करता है (जिससे रुद्र का वीभत्सपन दूर हो जाय) । (१०) ३५—अग्नि-मारुत शस्त्र को वैश्वानरीय सूक्त से आरम्भ करता है। यह जो वीर्य बहा वह वैश्वानर है। इसलिये होता अग्नि-मारुत शस्त्र को वैश्वानरीय सूक्त से आरम्भ करता है। पहली ऋचा को बिना ठहरे हुये पढ़े। जो अग्नि-मारुत शस्त्र को पढ़ता है वह आग की भयानक लपटों को शांत कर देता है। सांस साध कर अग्नि को पार करे। कहीं कुछ शब्द