ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय
Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)
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Read in context२१२ [ तीसरी पञ्चिका या ज्योतिष्टोम कहते हैं। यह परोक्ष रूप है। देव परोक्षप्रिय होते हैं। यह जो अग्निष्टोम है इसका न पूर्व है न पर ( न आदि है, न अन्त )। यह जो अग्निष्टोम है वह रथ के अनन्त चक्र के समान है। प्रायणीय और उदयनीय उसके दो पहियों के समान हैं। इसके विषय में एक गाथा है कि:-अग्निष्टोम का जो आदि है वह अन्त है और जो अन्त है वह आदि है। जैसे शाकल नामी सर्प वृत्ताकार में चलता है। यह नहीं मालूम होता कि आदि कहाँ है और अन्त कहाँ है। क्योंकि इसका प्रायणीय अर्थात् आरंभ ही अन्त है। इस पर कुछ शंका करते हैं कि प्रायण यानी आरंभ त्रिवृत अर्थात् ९ मंत्रों से होता है और अन्त २१ स्तोमों से। फिर एक से कैसे हुये ? इसका उत्तर यह है कि इनमें यह समानता है कि २१ स्तोम भी त्रिवृत हैं क्योंकि इनमें तीन तीन ऋचायें होती हैं और तृचों के लक्षण पाये जाते हैं। (५) ४४-अग्निष्टोम तपने वाला अर्थात् सूर्य है। सूर्य भी दिन में तपता है और अग्निष्टोम भी दिन में ही समाप्त हो जाना चाहिये। अग्निष्टोम साह्न ( एक दिन में समाप्त हो जाने वाला या एकाह्निक ) है इसलिये इसे जल्दी से नहीं करना चाहिये, न पहले सवन में, न मध्य सवन में और न तीसरे सवन में। नहीं तो यजमान शीघ्र मर जायगा। अगर प्रातः और दोपहर के सवनों को जल्दी से नहीं करते तो पूर्व की ओर ग्राम फूलते फलते हैं और अगर सायंकाल का सवन जल्दी से कर देते हैं तो पश्चिम का गाँव जंगल हो जाता है और यजमान मर जाता है इसलिये प्रातः, दोपहर और