ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय
Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)
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Read in context२२० [ तीसरी पञ्चिका निकाल सके। ऋषियों में से भरद्वाज ने उनको देखा और कहा यह असुर उक्थ्यों में छिपे हैं। इसलिये कोई और उनको देख नहीं सकता।" उसने इस मंत्र से अग्नि को बुलाया :— एह्य॒ षु ब्रवाणि तेऽग्न इत्येतरागिरः। एभिर्व॑र्धास इन्दुभिः। (ऋ० ६।१६।१६) "इतरा गिरः" (अर्थात् दूसरी वाणियाँ) असुरों की हैं। इस पर अग्नि उठा और कहने लगा "यह कृश (दुबला), दीर्घ (लम्बा), पलित (पीला) पुरुष क्या कहता है? क्योंकि भरद्वाज दुबला, लम्बा और पीला था। उसने कहा "यह असुर उक्थ्यों में प्रविष्ट हो गये। इन को कोई नहीं देख सकता।" अग्नि घोड़ा बनकर उनके पीछे दौड़ा, और उसने उनको पकड़ लिया। इससे साकमश्वंसाम" बन गया। तभी से यह "साकम- श्वंसाम" कहलाता है। इस पर लोग कहते हैं कि 'साकमश्वंसाम' से उक्थ्यों को शुरू करे। और जो उक्थ्य साकमश्वं से नहीं शुरू होते हैं उनको शुरू होते न समझना चाहिये। इस पर कुछ लोगों का कहना है कि प्रमंहिष्टीय से उक्थ्यों को शुरू करना चाहिये क्योंकि इन्हीं के द्वारा देवों ने असुरों को उक्थ्यों से निकाला था। ऋषि का कथन है कि चाहे प्रमंहिष्टीय से शुरू करे या साकमश्वंसाम से। जैसा जी चाहे। (५) ५०—असुर मित्रावरुण के उक्थ्य में घुस गये। इन्द्र ने कहा, "कौन मेरा साथ देगा कि हम दोनों इन असुरों को वहाँ से निकाल दें।" वरुण ने कहा, "मैं"। इसलिये तृतीय सवन में इन्द्र-वरुण के लिये मित्रावरुण का उक्थ्य पढ़ा जाता है। असुर यहाँ से निकल कर ब्राह्मणाच्छंसी में घुस गया। इन्द्र ने कहा, "मैं"। इसलिये तीसरे सवन में इन्द्र-बृहस्पति के