ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय
Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)
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Read in contextपहला अध्याय ] २३१ षोडशी को सब छन्दों से युक्त कर देता है। जो इस रहस्य को समझता है वह सब छन्दों से युक्त षोडशी द्वारा फूलता फलता है। (४) ५—दिन का देवों ने आश्रय लिया और रात का असुरों ने। वे दोनों बराबर शक्ति के थे और कोई किसी से न दबता था। इन्द्र ने कहा "मेरे साथ रात में कौन घुसेगा कि असुरों को यहाँ से निकाल दें।" लेकिन उसे देवों में कोई न मिला जो उसकी बात मानता। क्योंकि वे डरते थे कि रात का अंधकार मृत्यु है । यही कारण है कि आजकल भी लोग रात के समय निकट स्थान में जाते हुये भी डरा करते हैं। क्योंकि रात अंधेरी होती है और अंधेरी मृत्यु के समान है। छन्द उसके साथ चले। चूंकि छन्द रात के देवता हैं। न निविद् पढ़ा जाता है न पुरोरुक, न धाय्य। न इन्द्र और छंदों के सिवाय कोई देवता हैं। उन्होंने पर्यायों (सोम पात्र को बार बार देने को पर्याय कहते हैं) द्वारा घूम घूम कर असुरों को निकाला। चूंकि पर्यायों द्वारा उनको निकाला इस'लिये उनको पर्याय कहते हैं। पहले पर्याय में उन्होंने असुरों को रात के पहले भाग से निकाला। दूसरे पर्याय में बीच की रात से। और अन्त के पर्याय में पिछले पहर से। छंदों ने कहा, "केवल हमीं रात में (अपिशर्वर्या) तेरा साथ देते हैं।" इस लिए (ऋषि ऐतरेय ने) छंदों का 'अपि- शर्वराणि' नाम रख दिया। क्योंकि वे इन्द्र को जो मृत्यु रूपी यह हर पद में इस प्रकार जोड़े जाते हैं :- (१) एवाह्य वापाः पूर्वेषां हरिवः सुतानाम् । (२) एवहीन्द्रापो इदं सवनं केवलं ते । (३) एवाहि शक्रो ममद्धि सोमं मधुमन्तमिन्द्र (४) वशो हि शक्र सत्रा वृषञ्जठर आ वृषस्व ॥