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ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय

Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished592 pages

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पहला अध्याय ] २३३ इससे याज्यों में रूप समृद्धता आ जाती है। जो रूप समृद्धता है वही यज्ञ में फलीभूत होती है। पहले पर्याय में पहले पद को बोलते हैं। इससे वे असुरों के जो घोड़े और गायें हैं उनको ले लेते हैं। बीच के पर्याय में बीच के पद को दो बार बोलते हैं। और ऐसा करके वह असुरों की गाड़ियों और रथों को छीन लेते हैं। अन्तिम पर्याय में अन्त के पद को दो बार बोलते हैं। ऐसा करके वे असुरों से उनके शरीरों पर जो वस्त्र, या सोना या रत्न होते हैं उनको छीन लेते हैं। जो इस रहस्य को समझता है वह अपने शत्रु को सब लोकों से निकाल देता है और उनसे सब कुछ छीन लेता है। यहाँ प्रश्न होता है कि पवमान स्तोत्र दिन के ही हैं, रात के नहीं, फिर इनका रात में क्यों पाठ होता है। दोनों के एक से ही भाग कैसे होते हैं ? इसका उत्तर यह है कि नीचे के मंत्रों से जो शस्त्र भी हैं और स्तोत्र भी :- इन्द्राय मद् बने सुतं परिष्टोभन्तु नो गिरः। अर्कमर्चन्तु कारवः ॥ (ऋ० ८।६२।१६) इदं वसो सुतमन्धः पिबा सुपूर्णमुदरम्। अनाभयिन् ररिमा ते ॥ (ऋ० ८।२।१) इदं ह्यन्वोजसा सुतं राधानां पते। पिबा त्वस्य गिर्वणः ॥ (ऋ० ३।५१।१०) इस प्रकार रात भी पवमानवती हो जाती है। इस प्रकार दिन और रात दोनों पवमान युक्त हो जाते हैं। और उनके एक से भाग होते हैं। अब प्रश्न होता है कि जब १५ स्तोत्र दिन के लिये ही हैं