ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय
Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)
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Read in contextदूसरा अध्याय ] २३७ अश्विन इन्द्र के पीछे चले और कहा, “मघवन् ! हम इस दौड़ में जीतना चाहते हैं।” उनका यह साहस न हुआ कि इन्द्र से कहते “हट जाओ”। इन्द्र ने इस शर्त पर मान लिया कि मुझे भी भाग दो। उन्होंने स्वीकार कर लिया और अश्विन- शस्त्र में इन्द्र को स्थान दिया। इसीलिये अश्विन-शस्त्र में कई मंत्र इन्द्र के हैं। इस प्रकार अश्विन जीत गये और उनको इनाम मिल गया। चूँकि अश्विन जीत गये और उनको इनाम मिला इसलिये इस शस्त्र को अश्विन-शस्त्र कहते हैं। जो इस रहस्य को समझता है उसकी कामना पूरी हो जाती है। कुछ लोग पूछते हैं कि जब इस शस्त्र में अग्नि, उषा और इन्द्र के मंत्र हैं तो इसको अश्विन-शस्त्र क्यों कहते हैं। इसका उत्तर यह है कि अश्विन जीत गये। उनको इनाम मिल गया। जो इस रहस्य को समझता है उसकी कामना पूरी हो जाती है। (२) ९—अग्नि ने दौड़ में अपने रथ में खच्चर (अश्वतरी) जोड़े। दौड़ में अग्नि ने खच्चरियों की योनियाँ जला दीं। इस- लिये उनके सन्तान नहीं होती। उषा लाल गायों के रथ में दौड़ी। इसीलिये उषाकाल में लाल रंग चमकता है। यह उषा का रूप है। इन्द्र ने घोड़े के रथों में दौड़ की। इसलिये क्षत्रियों का रूप यह है कि बहुत कोलाहल हो। यही इंद्र का रूप है। अश्विनों ने गधों के रथ में दौड़ की और जीत गये। और इनाम पा गये। (चूँकि बहुत दौड़ने से थक गये। इसलिये गधों की तेजी जाती रही। और दूध मारा गया और रथ के वाहनों में सबसे कम हो गये। लेकिन अश्विनों ने गधे के वीर्य को शक्ति रहित नहीं किया। इसलिये वाजी अर्थात् गधे में दो