ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय
Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)
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Read in contextपहला अध्याय ] २८७ "घृतेन द्यावापृथिवी अभीवृते घृतश्रिया घृतपृचा घृतावृधा"। (ऋ० ६।७०।४) इसमें तीन शब्द आये हैं "घृत श्रिया", "घृतपृचा", "घृता- वृधे।" यहाँ 'घृत' शब्द की पुनरावृत्ति है और ( अन्त में तीन बार 'आ' आया है ) इससे 'निवृत्त' भी है। यह पुनरावृत्ति और निवृत्ति तीसरे दिन के रूप हैं। ऋभुओं का निविद् सूक्त यह है :- "अनश्वो जातो अनभीशुरुक्थ्य यो ३ रथस्त्रिचक्रः परिवर्तते रजः।" (ऋ० ४।३६) इसमें "रथस्त्रिचक्र" में 'त्रि' शब्द आ गया। यह तीसरे दिन का रूप है। वैश्वदेव का निविद् सूक्त यह है :- परावतो ये दिधिषंत आप्यम्। (ऋ० १०।६३) 'परावत' में 'अन्त' है। तीसरा दिन अन्त है। तीसरे दिन का रूप है। यह 'गय' सूक्त है। इससे 'प्लत' के पुत्र 'गय' ने देवों के प्रियधाम को पाया और परम लोक को जीता। जो इस रहस्य को समझता है वह देवों के प्रियधाम को पाता है और परम लोक को प्राप्त होता है। अग्नि-मारुत शस्त्र का प्रतिपद् ( आरम्भ ) यह है :- वैश्वानराय धिषणामृतावूधे (ऋ० ३।२) धिषणा में 'अन्त' है। तीसरा दिन (त्र्यह) अन्त होता है। यह तीसरे दिन का रूप है। मरुतों का निविद् सूक्त यह है :- धारावरामरुतो धृष्णवोजसो (ऋ० २।३४) इसमें बहुवचन है। बहुवचन अन्त है। तीसरा दिन अन्त है। यह तीसरे दिन का रूप है।