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ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय

Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished592 pages

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· २९० [ पाँचवीं पञ्चिका इस लोक का उल्लेख । चौथे दिन के अन्य रूप यह हैं :— जात, ह्व, शुक्र, वाक् का रूप, विमद, चिरिष्टित विच्छंद ( अर्थात् भिन्न-भिन्न छन्द ), जिसमें अक्षर कम या अधिक हों ; वैरुप्य और अनुष्टुभ्, और भविष्यकाल की क्रिया ! चौथे दिन का आज्य सूक्त यह है :— अग्निं न स्ववृक्तिभिः ( ऋ० १०।२१ ) इसका ऋषि 'विमद' है और सूक्त के हर मंत्र में 'वि वो मदे' आता है। यह चौथे दिन का रूप है। इसमें आठ ऋचा हैं और पंक्ति छन्द है। यज्ञ पांच हिस्से वाला है। पशु भी पांच हिस्से वाले हैं, यह पशुओं की प्राप्ति के लिये किया जाता है। इन आठ मंत्रों के दस जगती होते हैं, क्योंकि मध्य के त्र्यह ( चौथा, पांचवां और छठा दिन ) का प्रातः सवन जगती में होता है। यह चौथे दिन का रूप है। इन आठ मंत्रों के १५ अनुष्टुभ् होते हैं, यह दिन अनुष्टुभ् का है। और अनुष्टुभ् चौथे दिन का रूप है। इन ८ मंत्रों में २० गायत्री होते हैं। क्योंकि यह फिर आरंभ का दिन है, यह चौथे दिन का रूप है। इसके साथ न तो स्तुति हैं, न प्रशस्ति । तथापि यह साक्षात् यज्ञ है इस लिये यह चौथे दिन का आज्य होता है। इस प्रकार वह यज्ञ से यज्ञ को तानते हैं और वाग् को प्राप्त करते हैं। यह काम संतति के लिये किया जाता है। जो इस रहस्य को समझ कर यज्ञ करते हैं वह त्र्यह में निर्विघ्न संतति ( सिलसिले ) को प्राप्त होते हैं। अनुष्टुभ् प्रउग यह हैं :— वायो शुक्रो अयामि ते मध्वो अग्रं दिविष्टिषु । आ याहि सोम पीतये स्पार्हो देव नियुत्वता । ( ऋ० ४।४७।१ )