ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय
Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)
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Read in context३१० [ पाँचवीं पञ्चिका त्वामिद्धि हवामहे ( ऋ० ६।४६।१-२ ) से होता बृहत् योनि की ओर सब को फेरता है। क्योंकि क्रमानुसार यह बृहत् दिवस है। इन्द्रमिद्धे वतातये ( ऋ० ८।३।५-६ ) यह साम प्रगाथ है। इसमें निवृत्त आता है। यह छठे दिन का रूप है। तार्क्ष्य वही है :- त्यमुषु वाजिनं देवजूतम् । ( ७ ) १३- "एन्द्र पाह्य_पनः परावतो" ( १।१३० ) यह परुच्छेप ऋषि का सूक्त है। छन्द अतिच्छन्द है और इसमें सात पद हैं। यह छठे दिन का रूप है। "प्र घा न्वस्य महतो महानि" ( ऋ० २।१५ ) यह समानोदर्क है और छठे दिन का रूप है। 'अभूरकोरयिपतेरयीणाम्' ( ऋ० ६।३१ ) इस सूक्त में ५ वें मंत्र में यह पद है "रथमा तिष्ठतु विन्तृम्णाभीमम्' इसमें 'स्था' धातु का 'तिष्ठतु' अन्तवाला है। यह छठे दिन का रूप है। त्रिष्टुभ् छन्द के इस रूप से सवन स्थित रहता है और गिरने नहीं पाता। उप नो हरिभिः सुतम् ( ऋ० ८।९३।३१-३३ ) यह समानोदर्क पर्यास है। यह छठे दिन का रूप है। यह गायत्री छन्द में है। गायत्री इस त्र्यह के मध्य सवन का वाहक है। जो छन्द वाहक होता है उसी में निविद् रक्खा जाता है। इसलिये यह गायत्री छन्द वाला निविद् रक्खा गया है। वैश्वदेव शस्त्र का प्रतिपद् यह है- अभित्यं देवं सवितारमोण्योः ( यजु० ४।२५ ) यह अतिच्छन्द छन्द में है। यह छठे दिन का रूप है। इसके अनुचर यह हैं:-