ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय
Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)
Page 326 of 592
Read in context३१२ [ पाँचवीं पञ्चिका पिता ने कहा, "पुत्र, चिंता मत कर। अंगिरा स्वर्ग लोक के लिये सत्र कर रहे हैं। जब वह छठे दिन का कृत्य करने बैठते हैं वह भूल जाते हैं। उनसे छठे दिन के यह दोनों सूक्त (१०।६१,६२) पढ़वाओ। वे तुझको एक सहस्र देंगे जो कि सत्र करने वाले दिया करते हैं"। उसने कहा "अच्छा!"। वह तब उनके पास गया और कहा कि हे बुद्धि वाले लोगो ! मुझ मनु के पुत्र को ले लो"। उन्होंने कहा, "तुम क्या चाहते हो जो ऐसा कहते हो" ? उसने कहा, "मैं तुमको छठे दिन का कृत्य करने की विधि बताऊंगा। और जब तुम स्वर्ग को जाने लगो तो मुझे सत्र की दक्षिणा एक सहस्र देना"। उन्होंने उसने उनसे छठे दिन उन दो सूक्तों का पाठ कराया। तब उनको यज्ञ और स्वर्गलोक का ज्ञान हुआ। इसलिये छठे दिन यह दो सूक्त पढ़े जाते हैं कि यजमान को यज्ञ का ज्ञान हो जाय और स्वर्गलोक का निर्देश हो जाय। जब वह स्वर्ग को जाने लगे तो उन्होंने कहा, "हे ब्राह्मण यह सहस्र तुम्हारा है"। जब वह इस सहस्र को इकट्ठा कर रहा था तो एक मैले से कपड़ों का आदमी उतरा और कहने लगा, "यह मेरा है, मैं इसे यहाँ छोड़ गया था"। उसने कहा "यह मुझे अंगिरा दे गये हैं !" तब उसने कहा, "तो यह हममें से एक का है, तेरे पिता निश्चय करेंगे। वह अपन के पास गया। पिता ने पूछा, "क्या अंगिरा ने तुझे दक्षिणा नहीं दी?" उसने कहा, "उन्होंने तो दी थी। लेकिन एक मैले कपड़े