ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय
Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)
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Read in context३१८ [ पाँचवीं पञ्चिका सातवें दिन के आहान मंत्र वही हैं जो पहले दिन के और यह सातवें दिन का रूप है। वे मंत्र यह हैं :- आ त्वा रथं ( ८।६८।१-२ ) इदं वसो सुतं ( ८।२।१-२ ) इन्द्र नेदीय ( ८।५३।५-६ ) प्र तु ब्रह्मणस्पतिः ( १।४०।३-४ ) अग्निंनेता ( ३।२०।४ ) त्वं सोम क्रतुभिः ( १।६१।२ ) पिन्वन्त्यपः ( १।६४।६ ) प्र व इन्द्राय बृहते ( ८।८६।३ ) “कया शुभा सवयसः सनीडा” ( १।१६५ ) में “न जाय- मानो नशते न जात” यह पद आया है। इसमें 'जात' शब्द है। यह सातवें दिन का रूप है। इस 'कयाशुभीय' सूक्त से एकमत और दीर्घायु होती है। इस कयाशुभीय सूक्त के द्वारा इन्द्र, अगस्त्य और मरुत एकमत हो गये थे। 'कयाशुभीय' सूक्त के पढ़ने से होता एकमत करता है। लेकिन यह दीर्घायु भी करता है। जो इसकी कामना करे वह 'कयाशुभीय' सूक्त का पाठ करे। यह त्रिष्टुभ् छन्द में है। इसके ठहरे हुये पद से होता सवन को ठीक स्थान पर कायम रखता है और गिरने नहीं देता। “त्यं सुमेषं महयास्वर्विदम्” ( १।५२ ) इस सूक्त में पहले मंत्र के दूसरे पद में “अत्यं न वाजं ह वनस्य दं रथम्” में 'रथ' शब्द आया है यह सातवे दिन का रूप है। यह जगती छन्द में है। इस व्यह के मध्य सवन का छन्द जगती है। जो छन्द वाहक होता है उसों में निविद् रक्खा जाता है। इस लिये निविद् को जगती छन्द में रखते हैं। अब मैथुन सम्बन्धी सूक्त पढ़े जाते हैं। त्रिष्टुभ् और जगती