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ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय

Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished592 pages

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तीसरा अध्याय ] ३२१ सवन का छन्द गायत्री है। इसलिये यह गायत्री छन्द में है। अग्निमारुत शस्त्र का प्रतिपद् यह है :— “वैश्वानरो अजीजनत्” इसमें 'जात' शब्द है, यह सातवें दिन का रूप है। मरुतों का निविद् सूक्त यह है :— प्र यद्धरिख्ष्टुभमिषम्... । ( ऋ० ८।७ ) इसमें 'प्र' है। यह सातवें दिन का रूप है। जातवेदस मंत्र वही है :— जातवेदसे सुनवाम ( ऋ० १।६६।१ ) जातवेदों का निविद् यह है :— दूतं वो विश्ववेदसम् । ( ऋ० ४।८ ) इसमें 'जातवेद' का स्पष्ट वर्णन नहीं है। यह सातवें दिन का रूप है। यह छन्द गायत्री में हैं। इस त्र्यह के तीसरे सवन का वाहक गायत्री छन्द है। (२) १८—आठवें दिन का रूप यह है कि न 'अ' हो, न 'प्र' और 'स्थित' हो। आठवाँ वही है जो दूसरा। इसके रूप यह हैं :—ऊर्ध्व, प्रति, अन्तः, वृषण्, वृधन, बीच के पाद में देवता का निर्वचन, अन्तरिक्ष का उल्लेख, दो बार अग्नि शब्द, महद्, विहूत, पुनः, और वर्तमान कालिक क्रिया। अग्निं वो देवमग्निभिः सजोषा......( ऋ० ७।३ ) यह आठवें दिन का आज्य है। इसमें दो बार अग्नि आया है। यह आठवें दिन का रूप है। यह त्रिष्टुभ् छन्द में है। इस त्र्यह के प्रातः सवन का वाहक त्रिष्टुभ् छन्द है। इसके प्र-उग शस्त्र के मन्त्र यह हैं :-- कुविदङ्ग नमसा ये वृधासः पुरा देवा अनवद्यास आसन्। ते वायवे मनवे बाधितायाऽवासयन्नुषसं सूर्येण ॥ ( ऋ० ७।६१।१ ) २१