ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय
Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)
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Read in contextपाँचवाँ अध्याय ] ३४७ “हम देवतों से कहेंगे कि जो अग्निहोत्र दोनों दिन ( उभयेद्यु ) किया जाता है वह तीसरे दिन ( अन्येद्यु ) किया जाय ।” गन्धर्वगृहीता नामी कुमारी ने कहा, “हम पितरों से कहेंगे कि जो अग्निहोत्र दोनों दिन किया जाता है वह तीसरे दिन किया जाय ।” जो अग्निहोत्र तीसरे दिन किया जाता है वह शाम को सूर्यास्त के बाद और सबेरे को सूर्योदय स पहले किया जाता है। और जो अग्निहोत्र दोनों दिन किया जाता है वह सूर्यास्त से पहले और सूर्योदय के बाद । इसलिये अग्नि-होत्र सूर्य-उदय के बाद करना चाहिये । जो सूर्य-उदय से पहले अग्निहोत्र करता है वह चौबीस वर्ष में गायत्री लोक को प्राप्त हो जाता है। और सूर्योदय के बाद करने वाला बारहवर्ष में। जो सूर्योदय से पहले दो साल अग्निहोत्र करता है वह सूर्योदय के बाद एक साल अग्निहोत्र करने के बराबर है। जो इस रहस्य को समझ कर सूर्योदय पर अग्निहोत्र करता है वह एक साल में ही इतना समाप्त कर लेता है। इसलिये सूर्योदय पर अग्नि-होत्र करना चाहिये । जो शाम को सूर्यास्त के बाद और प्रातःकाल सूर्योदय के बाद अग्निहोत्र करता है वह अहोरात्र ( दिन रात ) के तेज में हवन करता है। रात्रि अग्नि से तेज लेती है और दिन सूर्य से । जो इस रहस्य को समझ कर सूर्योदय पर अग्नि- होत्र करता है उसका हवन अहोरात्र ( रात दिन ) के तेज में होता है। इसलिये सूर्योदय पर हवन करना चाहिये । (४) ५०—यह जो दिन रात हैं वे साल के दो चक्र हैं। उन्हीं दोनों चक्रों (पहियों) के द्वारा संवत्सर चलता है। जो सूर्योदय से पहले अग्निहोत्र करता है वह ऐसा है जैसे मानों एक चक्र से चलता हो। परन्तु जो सूर्योदय के बाद हवन करता है