ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय
Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)
Page 372 of 592
Read in context३५८ [ छठी पञ्चिका है। हम दूसरी ऋचायें इसमें जोड़ दें।" बस उन्होंने उसके मंत्रों में अन्य ऋचायें जोड़ दीं। अब राजा सोम उनको मद- युक्त न कर सका। उसके मंत्र में और ऋचायें शान्ति के लिये मिलाने से वह पाप के फल को निवृत्त कर सके। उन्हीं के अनुकरण में साँप अपने पापों को निवृत्त कर सके। और पुरानी केंचुल को छोड़कर नई ले सके। जो इस रहस्य को समझता है वह पाप को निवृत्त करता है। (१) २-प्रश्न है कि कितनी ऋचाओं से पत्थर पर सोम निचोड़े। सौ से। पुरुष शतायुः, शतवीर्य और शत-इन्द्रिय होता है। ऐसा करने से पुरुष शतायु, शतवीर्य और शत-इंद्रिय होता है। कुछ कहते हैं कि तेतीस ऋचायें बोले। क्योंकि तैंतीस देवताओं का पाप निवृत्त किया। देव तैंतीस हैं। कुछ कहते हैं कि अपरिमित ऋचायें बोले। क्योंकि प्रजापति अपरिमित है और पत्थर पर सोम निचोड़ने का कृत्य प्रजापति का है। इससे सब कामनायें पूरी हो जाती हैं। जो ऐसा करता है वह सब इच्छाओं को पूरी करता है। इसलिये अपरिमित मंत्र बोलना चाहिये। अब प्रश्न यह है कि कैसे मंत्र बोले ? अक्षर अक्षर या चार चार अक्षर या पद पद, या आधे आधे मंत्र या मंत्र मंत्र। मंत्र मंत्र तो पढ़े नहीं जाते। न पद पद पढ़े जाते हैं। यदि अक्षर अक्षर करके या चार चार अक्षर करके पढ़ें तो छन्द लुप्त हो जाते हैं। क्योंकि बहुत से अक्षर छूट जाते हैं। इस लिये आधे आधे मंत्र कह कर पढ़े। प्रतिष्ठा के लिये मनुष्य दोपाया है और पशु चौपाया। इस प्रकार वह चौपायों में यजमान को स्थापित करता है। इसलिये आधे आधे मंत्र करके पढ़ना चाहिये। इस पर शंका उठाते हैं कि जब मध्यदिन