ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय
Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)
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Read in context३७० [ छठी पञ्चिका पोता का याज्य मंत्र यह है :— मरुतो यस्य हि क्षये......( ऋ० १।८६।१ ) इसमें एक पद है “स सुगोपातमो जन” यह इन्द्र की ओर संकेत है क्योंकि इन्द्र गोपातम अर्थात् सबसे अच्छा रक्षक है। इससे इन्द्र को प्रसन्न करता है। नेष्टा का याज्य यह है :— अग्ने पत्नीरिहा वह......( ऋ० १।२२।६ ) इस मंत्र में 'त्वष्टारं सोमपीतये' आया है। यहाँ इन्द्र का वर्णन है। क्योंकि इन्द्र 'त्वष्टा' है। यह इन्द्र का रूप है। इस प्रकार वह उसको प्रसन्न करता है। अग्नीध्र का याज्य मंत्र यह है :— उक्षानाय वशानाय ( ऋ० ८।४३।११ ) इसमें 'सोमपृष्ठाय वेधसे' आया है। 'वेधस्' इन्द्र है। यह इन्द्र का रूप है। इससे इन्द्र को प्रसन्न करता है। अच्छावाक_के मत्र में तो अन्त में इन्द्राग्नी साक्षात् ही है इस लिये यह मंत्र स्वयंसमृद्ध है अर्थात् :— प्रातर्यावभिरा गतं देवेभिर्जेन्यावसू। इन्द्राग्नी सोमपीतये ॥ ( ऋ० ८।३८।७ ) इस प्रकार यह सब मंत्र इन्द्र के हो जाते हैं। जिनमें नाना देवतों का वर्णन है उनसे अन्य देवताओं को ही प्रसन्न नहीं करता। यह मंत्र गायत्री छन्द में हैं। यह अग्नि के हैं। इस प्रकार तीनों की प्राप्ति होती है अर्थात् इन्द्र, अन्य देवते और अग्नि। (२) ११—मध्य सवन में सोम के उठाने पर होता यह सूक्त पढ़ता है :— असावि देवं गो ऋजीकमंध......(ऋ० ७।२१।१)