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ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय

Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished592 pages

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३७२ [छठी पञ्चिका इनमें 'अभितृण्ण' वाले मंत्र हैं। इन्द्र ने पहले प्रातःसवन में विजय पाई थी। परन्तु इन मंत्रों द्वारा मध्यसवन में भेदन किया (अभितृण्यात्) इस लिये 'अभितृण्ण' वाले मंत्र बोले जाते हैं। (३) १२-तृतीय सवन में सोम के उठाने पर होता यह मंत्र बोलता है:-- इहोप यात शवसो नपातः (ऋ० ४।३५।१) इनमें वृषन्, पीत, सुत, मद् शब्द आये हैं। इस लिये इनमें रूपसमृद्धता है। यह इन्द्र के मंत्र हैं और ऋभुओं के हैं। इस पर प्रश्न है कि जब ऋभुओं की स्तुति नहीं की जाती तो यह तीसरे सवन के पवमान मंत्र ऋभुओं के क्यों कहलाते हैं ? (इसका उत्तर यह है) कि पिता प्रजापति ने मर्त्य ऋभुओं को अमर्त्य करके तीसरे सवन में भाग दिया। इसलिये ऋभुओं के मन्त्र तो नहीं बोलते किन्तु पवमान स्तोत्रों को आर्भव कहते हैं। एक ऋषि का प्रश्न है कि तीसरे सवन में त्रिष्टुप् छन्द क्यों लाते हैं ? प्रातः सवन का छन्द गायत्री है। मध्य सवन का त्रिष्टुभ और तीसरे सवन का जगती। इसका उत्तर यह देना चाहिये कि तीसरे सवन में सोमरस समाप्त हो जाता है (धीतरसं)। अगर तीसरे सवन में ऐसा छन्द बोला जाय जिसका रस अभी समाप्त नहीं हुआ (अधीतरस) जैसे त्रिष्टुम्् तो ऐसा करने से तृतीय सवन रस वाला हो जाता है। इस सवन में इन्द्र को भी भाग मिलता है। इस पर प्रश्न यह होता है कि जब तीसरा सवन इन्द्र और ऋभुओं का है, और उपस्थित सोम के लिये होता इन्द्र और ऋभुओं का ही याज्य मन्त्र बोलता है तो फिर इतर ऋत्विज नाना देवतों के याज्य क्यों बोलते हैं ?