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ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय

Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished592 pages

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३७४ [ छठी पञ्चिका इसमें 'रथमिव संमहेम' आया है। यह बहुवचन है। बहु- वचन ऋतुओं का रूप है। इस प्रकार यह सब मंत्र ऐन्द्र-आर्भव हो जाते हैं। दूसरे देवतों के मंत्रों से उन उन देवतों को भी प्रसन्न करता है। वह जगत् के विजेता हैं। इसलिये जगती छन्द की आव- श्यकता होती है। तीसरे सवन की समृद्धि के लिये। (४) १३—इस पर प्रश्न होता है कि कुछ होत्रों में उक्थ्य (शस्त्र) होता है। कुछ में नहीं होता। फिर सब होत्र बराबर और उक्थ्य वाले कैसे हो जाते हैं ? इसका उत्तर यह है कि ये उक्थ्य वाले और अनुक्थ्य वाले साथ-साथ पाठ करते हैं। इसलिये वे सब समान कहलाते हैं। और उनकी विषमता दूर हो जाती है। अब प्रश्न होता है कि होत्रक लोग प्रातः सवन और मध्य सवन में ही शस्त्र पढ़ते हैं। फिर यह तीसरे सवन में पढ़े के बराबर कैसे हो जाता है ? इसका उत्तर यह है कि वे मध्य सवन में दो दो सूक्त पढ़ते हैं। इस पर प्रश्न होता है कि होत्रक होता के बराबर दो सूक्त क्यों पढ़ते हैं ? इसका उत्तर यह है कि वे दो देवतों के लिये होते हैं। (५) १४—शंका होती है कि जब तीन होत्रक ही उक्थ्य वाले हैं अन्य नहीं। तो वे उक्थ्य वाले कैसे समझे जा सकते हैं? इसका उत्तर यह है कि अग्नीध्र का उक्थ्य आज्य है। पोता के याज्य का मरुत्वतीय। नेष्टा का वैश्वदेव। इस प्रकार यह याज्य उक्थ्य वाले हो जाते हैं। प्रश्न यह है कि अन्य होत्रकों को तो एक बार ही आदेश दिया जाता है तो पोर्ता को और नेष्टा को क्यों दो बार आदेश दिया जाता है ? (इसके लिये गाथा है) :—