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ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय

Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished592 pages

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३७६ [छठी पञ्चिका इन्द्र के कैसे होते हैं ? ( उत्तर यह है कि ) इन्द्र ने असुरों को उक्थ्यों से निकाल कर पराजित कर दिया और उसने देवों से कहा, "मेरा साथ कौन देगा ?" देवों ने कहा, "मैं, मैं।" और उन्होंने उसका साथ दिया। लेकिन चूँकि इन्द्र ने पहले विजय पाई, इसलिये स्तोत्रिय और अनुरूप इन्द्र के होते हैं। और चूँकि देवों ने कहा, "मैं साथ दूंगा" और दिया भी। इसलिये ब्राह्मणाच्छंसी और अच्छावाक् नाना देवतों के लिये मन्त्र पढ़ता है। (६) १५-फिर प्रश्न यह है कि जब तीसरा सवन वैश्वदेव का है तो तीसरे सवन के आरम्भ में इन्द्र के और जगती छन्द वाले मंत्र क्यों बोले जाते हैं ? उत्तर यह है कि इन्द्र से आरम्भ करके ही चलते हैं। जगती छन्द इसलिये है कि तीसरा सवन जगती से सम्बन्ध रखता है। जगत् की इच्छा के लिये। और जो कोई छन्द पीछे पढ़ा जाता है वह भी जगती से सम्बन्धित हो जाता है। जब तृतीय सवन के आरम्भ में इन्द्र के और जगती छन्द वाले सूक्त पढ़े जाते हैं। शस्त्रों के अन्त में अच्छावाक् त्रिष्टुभ् छन्द का सूक्त बोलता है :- स वां कर्मणा... ( ऋ० ६।६९।१) यह 'कर्म' से तात्पर्य 'सोमपान' की प्रशंसा है। इसमें 'समिषा' पद है। यहाँ 'इष' का अर्थ है अन्न। अन्न की प्राप्ति के लिये। "अरिष्टैर्नः पथिभिः पारयंत" इस पद के पढ़ने का तात्पर्य यह है कि वह प्रत्येक दिन कल्याण के लिये स्तुति करता है। यहाँ प्रश्न होता है कि जब तीसरा सवन जगती छन्द वाला है तो तीसरे सवन के अन्त में त्रिष्टुभ् छन्द क्यों पढ़ते हैं ? इसका उत्तर यह है कि त्रिष्टुभ् वीर्य है। अन्त में वीर्य की प्रतिष्ठा हो जाती है।

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