BharatKosha
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय

Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished592 pages

Page 393 of 592

Read in context
Page 393

चौथा अध्याय १७-प्रातः सवन में अहीन संतति के लिये (अर्थात् वह सोम यज्ञ जिनमें कई दिन लगते हैं और एक दिन और दूसरे दिनों में सिलसिला जारी रखना पड़ता है) जो अगले दिन के स्तोत्रिय को पहले दिन का अनुरूप करते हैं वह उसी प्रकार होता है जैसे एकाह् में (जिस सोम यज्ञ में एक ही दिन लगता है उसे 'एकाह्' कहते हैं)। जैसे 'एकाह्' के सवनों में सिलसिला होता है उसी प्रकार 'अहीन' के दिनों में भी। प्रातः सवन में अगले दिन के स्तोत्रिय को पहले दिन का अनुरूप इसलिये करते हैं कि 'अहीन' के दिनों में सिलसिला हो जाय। इस प्रकार सिलसिला हो जाता है। देवों और ऋषियों ने सोचा कि यज्ञ में सिलसिला क़ायम करें दिनों को समान करके। तब उन्होंने यह समानता सोची कि प्रगाथ एक ही हों, प्रतिपद् एक ही हों और सूक्त एक ही हों। इन्द्र घर का व्यापी सा है। वह यज्ञ में पहले भी चलता है और अगले दिनों में भी। (अर्थात् इन्द्र यज्ञ में सर्वत्र ( ७९ )