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ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय

Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished592 pages

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३८६ [ छठी पञ्चिका 'कः' नाम है प्रजापति का। यह 'कद्वन्त' मंत्र प्रजापति की प्राप्ति के लिये हैं। 'कं' नाम है अन्न का। यह 'कद्वन्त' अन्न की प्राप्ति के लिये हैं। ये यजमान प्रतिदिन शांत अहीन सूक्तों से जुड़े रहते हैं। उनको 'कद्वत्' प्रगाथों के द्वारा शांत करते हैं। इस प्रकार यह अहीन सूक्त शांत हो जाते हैं और शांत होकर स्वर्ग को ले जाते हैं। अहीन सूक्तों का आरम्भ त्रिष्टुभ् से करना चाहिये। कुछ लोग प्रगाथों से पहले इन (त्रिष्टुभों) को पढ़ते हैं और इनको 'धाय्या' कहते हैं। ऐसा नहीं करना चाहिये। होता राजा (शासक) है और होत्रक लोग प्रजा (रय्यत) हैं। (धाय्या को होता ही पढ़ता है। यदि होत्रक भी पढ़ने लगेंगे तो इसका अर्थ यह होगा कि) प्रजा ने राजा का विरोध किया। और यह पाप है। उसको जानना चाहिये कि ये त्रिष्टुभ् मेरे 'प्रतिपद' हैं। जिनसे समुद्र को तरते हैं। ('प्रतिपद' में यहाँ श्लेष है। प्रतिपद का अर्थ है आरम्भ और प्रतिपद का अर्थ है नाव का पतवार) जो द्वादशाह या संवत्सर यज्ञ करते हैं वह समुद्र पर तैरने वालों के समान हैं। जैसे समुद्र के उस पार पहुँचने के लिए जहाज पर सब सामान इकट्ठा करके तब बैठते हैं। इसी प्रकार यजमानों को त्रिष्टुभों से आरम्भ करना चाहिये। यह वीर्यवान् छन्द यजमान को स्वर्ग में ले जाकर फिर लौटाता नहीं। लेकिन इनमें 'आहाव' (शोंसावोम्) नहीं कहना चाहिये। छन्द समान गति से चलना चाहिये। होता को सोचना चाहिये कि मैं धाय्या न पढूँगा। जब इन सूक्तों को पढ़ें। प्रसिद्ध सूक्तों के आरम्भ से सूक्तों का समारोह करना चाहिये। (अर्थात् सूक्तों को त्रिष्टुभ् से शुरू