ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय
Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)
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Read in contextपाँचवाँ अध्याय ] ४०१ अब इन्द्र-गाथा ( अथर्व० २०।१२८।१२-१६ ) को पढ़ता है । इन्द्र-गाथाओं द्वारा देवों ने असुरों को गाकर हरा दिया। इसी प्रकार इन्द्र-गाथाओं द्वारा यजमान भी अपने वैरियों को हरा देता है। और उन पर विजय पाता है । इनको प्रतिष्ठा के लिये आधी आधी ऋचा करके पढ़ता है । ( ६ ) ३३—ब्राह्मणाच्छंसी 'ऐतशप्रलाप' पढता है । 'ऐतश' मुनि था। वह "अग्नेरायुः" ( अर्थात् अग्नि के जीवन ) मंत्रों का द्रष्टा हुआ । यह वह मंत्र हैं जिनके विषय में लोग कहते हैं कि यह मंत्र यज्ञ के सब दोषों को दूर कर देते हैं। उसने अपने पुत्रों से कहा, "प्यारे पुत्रो, मैंने 'अग्नेरायुः' मंत्रों का दर्शन किया है। मैं उनको तुमसे कहूँगा। मैं जो कुछ कहूँ, तुम अव- हेलना न करना ।" तब उसने कहना शुरू किया :—"एता अश्वा आ प्लवन्ते प्रतीपं प्राति सत्वनम्"...(अथर्ववेद २०।१२९।१ ) उसके वंश का अभ्यग्नि नाम का एक व्यक्ति असमय उसके पास गया और उसके मुँह को बन्द करके कहने लगा, "हमारा बाप पागल हो गया है।" तब उसके बाप ने कहा, 'जा, कोढ़ी हो जा, तू ने मेरी वाणी को मार दिया । नहीं तो मैं गाय के जीवन को सौ साल का और आदमी के जीवन को हजार साल का कर देता । परन्तु तू ने मुझे रोक दिया । मैं शाप देता हूँ कि तेरी संतान पापिष्ठ हो जाय ।" इसलिये कहावत है कि और्वाण गोत्र के ऐतशायनों में अभ्यग्नि लोग बहुत पापी हैं। कुछ लोग इन ( ऐतशप्रलाप ) को बहुत बढा देते हैं। किसी को इस बात का निषेध नहीं करना चाहिये । कहना चाहिये कि जितने चाहें मंत्र पढ़े । क्योंकि ऐतशप्रलाप जीवन है, जो इस रहस्य को समझता है वह इस प्रकार यजमान के जीवन को बढ़ा देता है। ऐतशप्रलाप का यह भी अर्थ है :—यह छन्दों का रस है ! २६