ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय
Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)
Page 417 of 592
Read in contextपाँचवाँ अध्याय ] ४०३ अतिवाद ( अथर्ववेद २०।१३५।४ ) को पढता है । अति- वाद से देवों ने असुरों को गाली देकर परास्त कर दिया । यजमान भी अतिवाद के द्वारा शत्रुओं को गाली देकर परास्त कर देते हैं । इसको आधा आधा मन्त्र करके पढ़ता है, प्रतिष्ठा के लिये । ( ७ ) ३४—देवनीथ ( अथर्ववेद २०।१३५।१-१७ (?) ) मन्त्रों को पढ़ता है । आदित्य लोग और अंगिरस लोग स्वर्ग में जाने के लिये लड़ पड़े कि हम पहले जायंगे, हम पहले जायँगे । अंगि- रसों ने मालूम कर लिया कि कल जो हम सोम यज्ञ करने वाले हैं उससे हम स्वर्ग लोक को पहले पहुँच जायंगे । उन्होंने अपने में से एक अग्नि नामी को भेजा कि जाकर आदित्यों से कह दो कि कल जो हम सोम यज्ञ करने वाले हैं उससे हम स्वर्ग में पहले पहुँच जायंगे । आदित्यों ने अग्नि को देखते ही सोम यज्ञ को जान लिया जिससे वह स्वर्ग को जा सकें । अग्नि ने उनके पास आकर कहा, "कल हम सोमयज्ञ करने वाले हैं जिससे हम स्वर्ग को पहुँच जायंगे ।" उन्होंने उत्तर दिया, "हम भी तुम से कहते हैं कि हम अभी सोम यज्ञ करने वाले हैं जिससे हम स्वर्गलोक में पहुँच जायंगे । लेकिन तुझको होता बनाकर ही हम स्वर्ग लोक में पहुँच सकते हैं", वह "अच्छा" कहकर लौट आया । और अंगिरसों से यह बात कह कर फिर आदित्यों के पास लौट आया । उन्होंने पूछा, "तू ने कहा ?" उसने कहा, "हाँ, मैंने कहा । ये कहने लगे कि क्या तूने हम को वचन नहीं दिया था । मैंने कहा कि वचन तो दिया था ( लेकिन आदित्यों को इनकार न कर सका ) क्योंकि जो यज्ञ रोपता है वह यश पाता है, और जो यज्ञ में विघ्न डालता है वह यश से वंचित हो जाता है । इसलिये मैंने नहीं रोका । इसलिये यदि कोई यज्ञ