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ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय

Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished592 pages

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पाँचवाँ अध्याय ] ४०७ इस देवों को पवित्र करने वाले से वह वाक् को पवित्र करता है। यह मंत्र अनुष्टुभ् छन्द में है। वाक् अनुष्टुभ् है। इस प्रकार इसी के निज छन्द से वह वाक् को पवित्र करता है। अब वह पावमान्य मन्त्रों ( ऋ० ९।१०१।४ ) को पढ़ता है :—सुतासो मधुमत्तमा...... पावमान्य मन्त्रदेवों को पवित्र करने वाले हैं। उसने सबसे उत्तम वीर्य वाले शब्द बोले। इस देवों को पवित्र करने वाले से वाक् को पवित्र करता है। यह अनुष्टुभ् छन्द में है। अनुष्टुभ् वाक् है। इस प्रकार वाक् को उसी के निज छन्द द्वारा पवित्र करता है। अब वह इंद्रबृहस्पति के मंत्र पढ़ता है :— अव द्रप्सो अं॑शुमतीमतिष्ठत्......(ऋ० ८।६६।१३-१५) इसके अन्त में है :— विशो अदेवी॑रभ्याचरं॑तीबृ॑हस्पतिना यु॒जे॑न्द्रः ससाहे ॥ ( ऋ० ८।६६।१५ ) "इन्द्र ने बृहस्पति की मदद से देवों के विरोधी लोगों को जो युद्ध में लड़ने आये हरा दिया", क्योंकि असुरों के लोगों को जब वे देवों से लड़ने आये इन्द्र ने बृहस्पति की सहायता से हरा कर भगा दिया। इसी प्रकार यजमान इन्द्र और बृहस्पति की सहायता से असुरों के लोगों को ( असुर्यं वर्णम् ) हराकर भगा देते हैं। इस पर कुछ लोग पूछते हैं कि छठे दिन (शस्त्रों के साथ यह सूक्त) पढ़ने चाहिये या नहीं ? इसका उत्तर यह है कि पढ़ना चाहिये। जब अन्य शस्त्रों के साथ पढ़े जाते हैं तो इनके साथ क्यों न पढना चाहिये। कुछ लोग कहते हैं कि न पढ़ना चाहिये। छठा दिन स्वर्ग लोक है। स्वर्ग लोक तक सबकी