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ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय

Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished592 pages

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दूसरा अध्याय ] ४१५ अब प्रश्न यह है कि अगर सभी हवियाँ बिगड़ जायें या खो जायें तो क्या प्रायश्चित्त है ? इसका प्रायश्चित यह है कि घी की आहुतियाँ ले और सब देवताओं का भाग अलग अलग करे । और याज्य हवि को इष्टि के रूप में दे । तब दूसरी इष्टि तैयार करे । यह यज्ञ ही उस यज्ञ का प्रायश्चित्त है। (३) ५-अब प्रश्न यह है कि अग्निहोत्र का सामान करने पर अगर अग्नि में कोई अनुचित वस्तु गिर पड़े तो क्या प्रायश्चित्त है ? इसका प्रायश्चित्त यह है कि इस सब को स्रुच में भर कर पूर्व को ले जाकर आहवनीय अग्नि में डाल दे। फिर आहवनीय के उत्तर के भाग से गर्म भस्म को लेकर मन में अग्नि के मंत्रों को जपकर या प्रजापति के मंत्र को पढ़ कर आहुतियाँ दे दे। इस प्रकार आहुति जल तो जाती है लेकिन यथा रीति हवन नहीं होता। चाहे एक आहुति खराब हो चाहे अधिक, प्राय- श्चित्त वही है। यदि दुष्ट पदार्थ को फेंककर अदुष्ट पदार्थ डाल कर आहुति दे तो क्रमानुकूल आहुति दे । यह प्रायश्चित्त है। अब प्रश्न यह है कि यदि अग्नि होत्र के लिये पकाई गई हवि गिर जाय या उबल कर निकल जाय तो इस का क्या प्रायश्चित है ? उस पर जल छिड़क दे । शान्ति के लिये । जल ही शान्ति है। सीधे हाथ से उसे छू कर यह मंत्र जपता है :- “दिवं तृतीयं देवान् यज्ञो गात् । ततो मा द्रविणमाष्टांतरिक्षं तृतीयं पितॄन् यज्ञो गात् । ततो मा द्रविणमाष्ट पृथिवीं तृतीयं मनुष्यान् यज्ञो गात् ह । ततो मा द्रविणमाष्ट ।” “तीसरा यज्ञ के रूप में द्यौ लोक में देवों के पास जावे । यहाँ से मुझे धन मिले । तीसरा यज्ञ के रूप में अन्तरिक्ष में पितरों के पास जावे । वहाँ से मुझे धन मिले । तीसरा यज्ञ के