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ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय

Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished592 pages

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४१८ [सप्तम पञ्चिका या केवल 'अग्नये विविचये' से आहवनीय में घी की आहुति दे देवे। यही इसका प्रायश्चित्त है। अब प्रश्न है कि यदि किसी की अग्नियां दूसरे की अग्नियों में मिल जायें तो क्या प्रायश्चित्त है ? "क्षामवत् अग्नि" के लिये आठ कपालों का पुरोडाश बनावे, उसका याज्य मन्त्र यह है :— अक्रन्ददग्निः स्तनयन्निव द्यौः...(ऋ० १०।४५।४) अनुवाक्य यह है :— अधा यथा नः पितरः परासः...(ऋ० ४।२।१६) या केवल 'अग्नये क्षामवते स्वाहा' से आहवनीय में घी की आहुति दे देवे। यही इसका प्रायश्चित्त है। (५) ७—अब प्रश्न है कि यदि किसी की अग्नियां गाँव की अग्नि के साथ जल उठें तो क्या प्रायश्चित्त है ? वह 'अग्नि संवर्ग' के लिये आठ कपालों का पुरोडाश बनाये, उसका याज्य यह है :— कुवित् सु नो गविष्टये...(ऋ० ८।७५।११) अनुवाक्य यह है :— मा नो अस्मिन्महाधने...(ऋ० ८।७५।१२ या केवल 'अग्नये संवर्गाय स्वाहा' से आहवनीय अग्नि में घी की आहुति देवे। यही उसका प्रायश्चित्त है। अब प्रश्न है कि यदि किसी की अग्नियां दिव्य अग्नि से मिल जायें तो इसका क्या प्रायश्चित्त है ? वह 'अग्नि अप्सुमत्' के लिये आठ कपाल का पुरोडाश बनावे। याज्य मंत्र यह है— अप्स्वग्ने सधिष्टव...(ऋ० ८।४३।६) अनुवाक्य यह है :— मयो दधे मेधिरःपूतदक्षो...(ऋ० ३।१।३)

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