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ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय

Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished592 pages

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४२४ [ सातवीं पञ्चिका को आहुति दे, न पितरों को, न मनुष्यों को। इसलिये अपत्नीक भी अग्निहोत्र करे। इस विषय में एक गाथा कही जाती है :— “यजेत् सौत्रामण्यामपत्नीकोऽप्यसोमपः। माता पितृभ्यामनृणार्थं द्वि यज ।” “अपत्नीक असोमप भी सौत्रामणि में यज्ञ करे। माता पिता का ऋण चुकाने के लिये यज्ञ करे।” इस श्रुति के वचन से सोम यज्ञ भी करे। (८) १०—प्रश्न है कि अपत्नीक वाक् (मंत्रों से) अग्निहोत्र कैसे करे ? पत्नी के मर जाने से अग्निहोत्र का अधिकार नष्ट हो जाता है। फिर वह कैसे अग्निहोत्र करे ? एक मनुष्य के इस लोक में और उस लोक में भी पुत्र, पौत्र और नाती होते हैं। यह लोक ही स्वर्ग लोक है (अर्थात् इस लोक के यज्ञ से स्वर्ग होता है)। वह सन्तान से कहे, ‘इस स्वर्ग से मैं उस स्वर्ग को पहुँचा’। अगर (दूसरी) पत्नी की इच्छा न हो तो उसके लिये उसकी संतान यज्ञ को कायम रखती हैं। अपत्नीक अग्निहोत्र कैसे करे ? श्रद्धा पत्नी है। सत्य यजमान है। श्रद्धा और सत्य का बड़ा अच्छा जोड़ा है। श्रद्धा और सत्य के जोड़े से स्वर्गलोकों को प्राप्त करता है। (९) ११—अब प्रश्न होता है कि यदि दर्शपूर्णमास यज्ञों के उपवास के दिन (एक दिन पहले) कोई व्रत न करे तो देव हवि को नहीं खाते। इस लिये उपवास के दिन देव व्रत करें तो देव हवि को खायेंगे। पूर्णमासी के पहले भाग में उपवास करे यह पैंग्य की राय है। पिछले भाग में, यह कौषीतकि की। पूर्णमासी के पहले भाग को अनुमति कहते हैं। पिछले को राका। अमावस्या के पहले भाग को सिनीवाली, पिछले को