ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय
Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)
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Read in context३० [ प्रथम पञ्चिका कहा, "अच्छा, परन्तु मैं एक वर मागूँगी"। उसने कहा, "माँग" उसने यही वर माँगा, "यज्ञ मुझसे आरम्भ हो और मुझसे समाप्त हो।" उन्होंने ने कहा, "अच्छा"। इसलिये अदिति का चरु आरम्भ में होता है और समाप्ति भी अदिति के चरु से ही होती है क्योंकि यही वर उसने माँगा था। अब उसने यह वर माँगा. "मेरे ही द्वारा पूर्व दिशा को तुम जानो, अग्नि के द्वारा दक्षिण दिशा को तुम जानो, अग्नि के द्वारा दक्षिण दिशा को, सोम के द्वारा पश्चिम, सविता के द्वारा उत्तर दिशा को"। अब (होता) पथ्या के अनुवाक्य और याज्य मंत्रों❄ को बोलता है। चूँकि पथ्या का अनुसरण करता है इसलिये यह (सूर्य्य) पूर्व से उदय होता और पश्चिम में अस्त होता है। अब अग्नि के अनुवाक्य और याज्य मंत्रों को बोलता† है। इसीलिये ओषधियाँ दक्षिण में पहले पकती हैं। क्योंकि ओषधियां अग्नि से सम्बन्ध रखती हैं। ❄ पथ्या के अनुवाक्य और याज्य मंत्र यह हैं :- १ स्वस्ति नः पथ्यासु धन्वसु स्वस्त्यप्सु वृजने खर्वति। स्वस्ति नः पुत्रकृथेषु योनिषु स्वस्ति राये मरुतो दधातन॥ २ स्वस्ति रिद्धि प्रपथे श्रेष्ठा रेक्ण स्वस्त्यभि या वाममेति। सा नो अमा सो अरणे नि पातु स्वावेशा भवतु देव गोपा॥ (ऋ० १०।६३।१५,१६) † अग्नि के अनुवाक्य और याज्य मंत्र यह हैं :- १ अग्ने नय सुपथा राये अस्मान् विश्वानि देव वयुनानि विद्वान्। युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नम उक्तिं विधेम। (ऋ० १।१८९।१) २ आ देवानामापि पन्थामगन्म यच्छक्नवाम तदनु प्रवोढुम्। अग्निर्विद्वान्स यजातसेदु होता सो अध्वरान्त्स ऋतून् कल्पयाति॥ (ऋ० १०।२।३)