BharatKosha
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय

Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished592 pages

Page 446 of 592

Read in context
Page 446

४३२ [सातवीं पञ्चिका रोहित ने सोचा कि एक ब्राह्मण ने मुझसे विचरने के लिये कहा है इसलिये वह चौथे साल भी वन में विचरता रहा । जब वह वन से आकर गाँव में घुसने लगा तो इन्द्र ने पुरुष के रूप में उससे कहा, "कलि जमीन पर पड़ा रहता है, द्वापर ऊपर मंडलाता है । त्रेता खड़ा रहता है और सत् युग चलता रहता है । इस लिये विचरता रह" । रोहित ने सोचा कि ब्राह्मण ने मुझसे विचरने के लिये कहा है इस लिये वह पाँचवें वर्ष भी वन में फिरता रहा । जब वह जंगल से आकर गाँव में घुसने लगा तो इन्द्र ने पुरुष के रूप में उससे कहा, "जो विचरता है उसको मधु और उदुम्बर का मीठा फल मिलता है । सूर्य के सौन्दर्य को देख कि विचरता हुआ ऊवता नहीं । इसलिये विचरता रह" । रोहित ने सोचा कि एक ब्राह्मण ने मुझे विचरने के लिये कहा है। इसलिये वह छठे साल विचरता रहा । वह जंगल में सुयवस ऋषि के पुत्र अजीगर्त से, जो बिना भोजन के रह रहा था, मिला । उसके तीन लड़के थे शुनः पुच्छ, शुनः शेप और शुनोलांगूल । उसने उससे कहा, 'ऋषि, मैं तुमको सौ गायें दूंगा, तुम मुझे इन पुत्रों में से एक दे दो कि मैं यज्ञ में इसके द्वारा अपने को बचा सकूँ' । अजीगर्त ने ज्येष्ठ पुत्र को लेकर कहा "इसे मत लो", माता ने कनिष्ठ के लिये यही कहा । वे दोनों बीच के शुनः शेप के लिये राजी हो गये । वह सौ गायें देकर उसको लेकर वन से ग्राम में आया । और पिता से बोला, "मैं इसके द्वारा अपने को यज्ञ की बलि से बचाऊँगा," वह वरुण के पास आकर बोला, 'मैं इसके द्वारा तेरा यज्ञ करूँगा ।" वरुण ने कहा, "अच्छा, क्योंकि क्षत्रिय से ब्राह्मण और अच्छा ।" तब वरुण ने उसको राजसूय यज्ञ की विधि