ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय
Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)
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Read in context.तीसरा अध्याय ] ४३५ आश्विना वश्वा......(१७) समानयाजनो हि वां......(१८) न्यध्र्यस्य मूर्धनि......(१६) (ऋ० १।३०।१७-१९ । अश्विनों ने उससे कहा, "तू उषा की स्तुति कर। तब हम छोड़े गे"। उसने अगले तीन मंत्रों से उषा की स्तुति की। कस्त उषः कधप्रिये......(२०) वयं हिते अमन्मह्या......(२१) त्वं त्येभिरा गहि......(२२) (ऋ० १।३०।२०-२२) उसके एकाएक मंत्र पढ़ने पर उसके बंधन खुलते गये और ऐक्ष्वाक का पेट पटकता गया। जब वह अन्तिम मंत्र पढ़ चुका तो अन्तिम बंधन टूट गया और हरिश्चन्द्र स्वस्थ हो गया ।(४) १७—अब ऋत्विजों ने शुनःशेप से कहा, "अब तू हममें से ही है। आज के यज्ञ में भाग ले"। अब शुनःशेप ने “अंजः सव” अर्थात् सोमरस निकालने की विशेष विधि को निकाला। और नीचे की चार ऋचाओं द्वारा सोम रस निकालाः— यच्चिद्धि त्वं गृहेगृह उलूखलक युज्यसे । इह द्युमत्तमं वद जयतामिव दुन्दुभिः ॥५॥ उत्तस्मते वनस्पते......(६) आयजी वाजसातमा......(७) तानो अद्य वनस्पती......(८) (ऋ० १।२८।५-८) और नीचे के मंत्र से उसे द्रोणकलश में रक्खाः—