BharatKosha
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय

Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished592 pages

Page 451 of 592

Read in context
Page 451

तीसरा अध्याय ] ४३७ हे अंगिरा के पुत्र, तूने तीन सौ गायों को मुझसे अधिक समझा”। सुयवस के पुत्र अजीगर्त ने कहा, “हे तात, मैं अपने किये पर दुखी हूँ। मैं उसका निवारण करता हूँ। मैं सौ गायें तुझे देता हूँ”। शुनःशेप ने कहा, “जो एक बार पाप कर सकता है, वह दूसरी बार भी पाप कर सकता है। तू शूद्रत्व से मुक्त नहीं है। जो पाप तूने किया है वह किसी प्रकार निवृत्त नहीं हो सकता”। विश्वामित्र ने टोक कर कहा, “हाँ, निवृत्त नहीं हो सकता”। विश्वामित्र ने कहा, “यह सुयवस का पुत्र जब हाथ में तलवार लिये मारने को तैयार था उस समय बड़ा भयानक लगता था। इस लिये तू उसका पुत्र मत बन। मेरा पुत्र हो जा।” तब शुनःशेप ने पूछा, “हे राजपुत्र, कहो कि मैं अंगिरा का पुत्र आपके गोत्र में कैसे आ सकता हूँ?” विश्वामित्र ने कहा, “तू मेरे पुत्रों में ज्येष्ठ हो। तेरी सन्तान श्रेष्ठ हो। तू मेरे दाय भाग का अधिकारी होगा। मैं मन्त्रों से तुझे पुत्र बनाता हूँ।” शुनःशेप ने कहा “हे भरत-ऋषभ, तू अपने पुत्रों से कह दे कि वे मुझे प्रीति से स्वीकार करें। तब मैं तेरा पुत्र बन जाऊँगा।” तब विश्वामित्र ने अपने पुत्रों से कहा, “हे मधुच्छन्दा, ऋषभ, रेणु और अष्टक, और जो तुम्हारे भाई लोग हैं, वे सुनें कि इसको अपना ज्येष्ठ समझो”। (५) १८—विश्वामित्र ऋषि के १०० पुत्र थे। पचास मधुच्छन्दा से बड़े और पचास छोटे। बड़ों को अच्छा न लगा। तब

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित) · Page 451 of 592 · BharatKosha