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ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय

Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished592 pages

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४४२ [ सातवीं पञ्चिका जिस राजा को इस प्रकार याचना करके यज्ञ का स्थान मिल गया और जिसने इन मंत्रों का पाठ कर लिया उसकी श्री दिन प्रति दिन बढ़ेगी। उसे प्रजाओं का ऐश्वर्य और आधिपत्य भी सदैव प्राप्त रहता है। ( २ ) २१—अब इष्टापूर्त-परिज्यानि आहुतियाँ देवें। यह आहु- तियाँ दीक्षा से पहले ही देनी चाहियें। यह चार घी की आहु- तियाँ आहवनीय में दी जाती हैं। यह कहकर :— इष्टापूर्तस्या परिज्यान्त्यै पुनर्न इन्द्रो मघवा ददातु । ब्रह्म पुनरिष्टं पूर्तं दात् स्वाहा । “इन्द्र मघवा इस आहुति का पूरा प्रति फल दे। ब्रह्म इस आहुति का पूरा फल दे।” अब पशु को बाँधने के लिये जो समिष्ट यजु पढ़ने चाहियें उनको पढ़ने के पश्चात् यह मंत्र पढ़े :— पुनर्नो अग्निर्जातवेदा ददातु । क्षत्रं पुनरिष्टं पूर्तं दात् स्वाहा । यह दोनों इष्टापूर्त-परिज्यानि आहुतियाँ हैं जिनको दीक्षा पाने वाले क्षत्रिय को देनी चाहियें। इसलिये यह दोनों आहुतियाँ देनी चाहियें। ( ३ ) २२—आराह्न के पुत्र सौजात का कहना है कि अजीत पुनर्वणथ की यह दो आहुतियाँ इच्छा पर निर्भर हैं। चाहे तो दे। जो इस कथन के अनुसार आहुतियाँ दे वह यह पढ़े :— ब्रह्म प्रपद्ये ब्रह्म मा क्षत्राद् गोपाय तु ब्रह्मणो स्वाहा । यह ऐसा ही है। जो यज्ञ को करता है वह ब्रह्मा को प्राप्त करता है 'यज्ञ ब्रह्म है। जो दीक्षा लेता है वह यज्ञ से फिर जन्मता है। जो ब्रह्मप्रपन्न है उसको क्षत्र नहीं छोड़ सकता । यह जो कहा “ब्रह्म मा क्षत्राद् गोपायतु” इसका अर्थ है कि ब्रह्म मुझे क्षत्र से