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ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय

Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished592 pages

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४४४ [ सातवीं पञ्चिका को प्राप्त करता हूँ। मैं गायत्री छन्द, तीन स्तोम, सोम राजा, और ब्रह्म को प्राप्त होता हूँ, मैं ब्रह्म हो गया हूँ।” जब आहवनीय के पास खड़ा होकर वह यह आहुति देता है तो उसके क्षत्र होने पर भी इन्द्र उससे इन्द्रिय नहीं लेता, न त्रिष्टुभ् वीर्य, न १५ स्तोम आयु, न सोम राज्य, और न पितर यश और कीर्ति। (५) २४—क्षत्रिय अग्नि देवता से दीक्षित होता है, गायत्री छन्द से, त्रिवृत स्तोम से, ब्राह्मण के सम्बन्ध से। यज्ञ को समाप्त करने पर वह क्षत्रिय हो जाता है। अग्नि उससे तेज ले लेता है, गायत्री वीर्य ले लेती है, त्रिवृत स्तोम आयु और ब्राह्मण ब्रह्म, यश और कीर्ति को ले लेते हैं, यह कह कर कि अब यह हम से भिन्न हो गया, अब यह क्षत्रिय है। अब यह क्षत्र में परिवर्तित हो गया है। (तात्पर्य यह है कि यज्ञ के समय उसमें ब्रह्मत्व आ गया था। अब वह फिर क्षत्रिय हो गया)। पशु बंधन सम्बन्धी समिष्ट यजु की आहुतियां देने के पश्चात् वह आहवनीय के पास आवे और कहे, “मैं अग्नि देवता को छोड़कर नहीं जा रहा, न गायत्री छन्द को, न त्रिवृत स्तोम को। न ब्रह्म के सम्बन्ध को। मुझ से अग्नि तेज को न ले, गायत्री वीर्य को न ले, त्रिवृत स्तोम आयु को न ले, ब्राह्मण ब्रह्म, यश और कीर्ति को न लें। तेज, वीर्य, आयु, ब्रह्म, यश और कीर्ति के साथ मैं इन्द्र के पास आता हूँ। और त्रिष्टुभ् छन्द के पास और १५ स्तोम के पास, सोमराजा के पास, मैं क्षत्रत्व में प्रवेश करता हूँ। मैं क्षत्रिय हुआ जाता हूँ। “हे देवपितर, हे पितर देव, जो मैं हूँ उसी रूप में यज्ञ करता हूँ (अर्थात् क्षत्रिय के रूप में, न कि ब्राह्मण के रूप में)। जो