ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय
Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)
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Read in contextदूसरा अध्याय ] ३३ दोहराता है। पथ्या के याज्य मंत्रों को दुहरा कर वह वाणी को यज्ञ के पहले रखता है। अग्नि प्राण है और सोम अपान। सविता प्रेरणा के लिये है और अदिति स्थापना के लिये। जब पथ्या के लिये याज्य मंत्र बोलता है तब वह यज्ञ को पथ अर्थात् मार्ग पर डाल देता है। अग्नि और सोम दो आँखें हैं। सविता प्रेरणा के लिये है और अदिति स्थापना के लिये। देवों ने यज्ञ को आँख से ही जाना। जो अप्रज्ञेय अर्थात् न जानी हुई चीज़ है उसे आँख से ही जानते हैं। जो अटकने पर आँख के निरन्तर प्रयोग के द्वारा जान लेता है वह जान लेता है। देवों ने जो यज्ञ को जाना वह इसी पृथ्वी पर जाना। इसी पृथ्वी पर यज्ञ की चीजें इकट्ठी कीं। इसी पृथ्वी पर यज्ञ ताना जाता है। इसी पर यज्ञ किया जाता है। इसी पृथ्वी पर यज्ञ की चीजें इकट्ठी की जाती हैं। यह पृथिवी ही अदिति है। अन्तिम याज्य मंत्र इसी अदिति के लिये है। यह अन्तिम याज्य मंत्र यज्ञ को जानने के लिये और पीछे से स्वर्ग को देखने के लिये बोला जाता है। (२) ९—कहा जाता है कि देवों की “साधारण जनता” ❀ होनी चाहिये। क्योंकि जब देवों की जनता होगी तो मनुष्य की भी होगी। जब सब जनता मिल गई तो यज्ञ तैयार हो गया। जिस जनता में इस रहस्य का समझने वाला 'होता' होता है उसके ❀ विश इत्ययं शब्दः प्रजामात्रवाची, वैश्यजाति विशेष वाची वा; सन्ति हि देवेष्वपि जाति विशेषाः ।—सायण हमारी सम्मति में विट् या मरुत् का अर्थ प्रजामात्र, या साधारण जनता (common people) है। यहाँ वैश्य जाति से तात्पर्य नहीं है। तात्पर्य यह है कि साधारण जनता का सहयोग यज्ञ के लिये आव- श्यक है। 'जनता' शब्द मूल में आया भी है (यज्ञोऽपि तस्यै जनतायै कल्पते यत्रैवं विद्वान् होता भवति )। ३