ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय
Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)
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Read in context४५८ [आठवीं पञ्चिका नृभिर्धूतः सुतो……(२) तं ते यवं यथा……(३) (ऋ० ८।२१-३) पवमान उक्थ मरुत्वतीय शस्त्र है जिसमें रथंतर साम है। (मध्य सवन में) पवमान स्तोत्र को रथंतर की रीति से गाते हैं। सहारा देने के लिये बृहत् पृष्ठ है। पहले और पिछले स्तुति के मन्त्रों को रथंतर से गाते हैं। रथंतर ब्राह्मण है, बृहत् क्षत्रिय है। ब्राह्मण क्षत्रिय से पहले होता है। राजा को समझना चाहिये कि जब ब्राह्मण मेरे आगे हैं तो मेरा राष्ट्र सुदृढ़ और विघ्नरहित होगा। रथन्तर अन्न है। पहले रखने से वह राजा को खाना प्राप्त कराता है। रथन्तर यह पृथ्वी है, यह प्रतिष्ठा है। पहले रखने से यह राजा को प्रतिष्ठा देता है। इन्द्र को बुलाने का प्रगाथ वही है बिना किसी तबदीली के (अविभक्तः) जो कि और सोम दिनों का है। ब्रह्मणस्पति का प्रगाथ जिसकी विशेषता “उत्” है दोनों सामों में एक सा है। धाय्या भी वही है बिना तबदीली के। मरुत्वतीय प्रगाथ ऐकाहिकों का विशेष है। (१) २—(पवमान उक्थ्य) का निविद् सूक्त यह है :— जनिष्ठा उग्रः……(ऋ० १०।७३) इसमें 'उग्र' भी है और 'सह' भी। यह क्षत्र का रूप है। 'ओजिष्ठ' भी क्षत्र का रूप है। 'बहुलाभिमानः' में 'अभि' शब्द है जो 'पराजित करने का' रूप है। इस सूक्त में ११ ऋचायें हैं। त्रिष्टुभ् में ११ अक्षर होते हैं। क्षत्रिय त्रिष्टुभ् का रूप है। ओज इन्द्र का बल है। यह त्रिष्टुभ् है। ओज क्षत्रिय का वीर्य है। इस प्रकार वह राजा को ओज, क्षत्र और वीर्य से सम्पन्न करता है। यह 'गौरिवीत' सूक्त है। इससे मरुत्वतीय शस्त्र समृद्ध हो जाता है। इसका ब्राह्मण पहले कहा जा चुका है।