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ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय

Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished592 pages

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चौथा अध्याय ] ४८१ स्वादिष्ठया मदिष्ठया पवस्व सोमधारया इन्द्राय पातवे सुते ॥ ( ऐ० ८।८ ) अब जो शेष रहे उसको इन दो मंत्रों को पढ़ कर पिये :— (१) रसिनः सुतस्य यदिन्द्रो अपिबच्छचीभिः इदं तदस्य मनसा शिवे न सोमं राजानिह भक्षयामि ॥ और (२) अभित्वा वृषभा सुते ···( ऋ० ८।४५।२२ ) सुरा में जो सोम का असर है उसको जैसे इंद्र के लिये महाभिषेक हुआ उसी प्रकार राजा का महभिषेक करके राजा को पिलाते हैं। सुरा को नहीं। और इन दो मंत्रों को पढ़ते हैं :— अपाम सोमम्···( ऋ० ८।४८।३ ) शन्नो भव चक्षसा···( ऋ० १०।३७।१० ) जिस प्रकार प्रिय पुत्र पिता का और प्रिय स्त्री पति का आलिङ्गन करके आनन्दित होती है उसी प्रकार यह राजा भी इन्द्र के समान महाभिषेक कराने के पश्चात् सोम या सुरा पान करके या अन्नाद्य खाकर आनन्दित होता है और अपने को भूल जाता है। (६) २१—कवष के पुत्र तुर ने परीक्षित के लड़के जनमेजय का वही राज्यभिषेक किया था जो इन्द्र का हुआ था। इसलिये जनमेजय सर्वत्र विजयी हुआ और उसने अश्वमेध यज्ञ किया । इसके सम्बन्ध में यह गाथा कही जाती है :— आसंदीवति धान्यादं रुक्मिणं हरितस्रजम् । अश्व बबंध सारंगं देवेभ्यो जनमेजयः ॥ “जनमेजय ने देवों के लिये तख्त के पास धान्य खाने वाले, माथे पर चिह्न वाले और हरी माला वाले घोड़े को बांधा।” ३१