ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय
Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)
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Read in contextचौथा अध्याय ] ४८३ सुदास का महाभिषेक किया और उसने पृथ्वी भर में घूम कर विजय पाई और अश्वमेध यज्ञ किया । इन्द्र के इसी राज्याभिषेक से अंगिरस् के पुत्र संवर्त ने अविक्षित के पुत्र मरुत्तम का अभिषेक किया और यह सारी पृथ्वी पर घूमा, उसे विजय किया और उसने अश्वमेध यज्ञ किया । इसी के विषय में यह श्लोक गाया जाता है,— मरुतः परिवेष्टारो मरुत्तस्यावसन् गृहे । आविक्षितस्य कामप्रेर्विश्वे देवाः सभासदः ॥ "मरुत लोग मरुत के घर में अन्न बांटने वाले रहे । इसकी सब कामनायें पूरी हुईं और विश्वेदेव वहाँ मौजूद थे ।” (७) २२—इसी इन्द्र के अभिषेक से अत्रि के लड़के उद्मय ने अंग का अभिषेक किया । उससे अंग ने पृथ्वी की विजय की और अश्वमेध यज्ञ किया । उस अलोपांग ( नहीं लोप हुआ कोई अंग जिसका ) ने एक बार कहा था, "हे ब्राह्मण, मैं तुम्हे दस हज़ार हाथी और दस हज़ार दासियाँ देता हूँ, अगर तू मुझे अपने यज्ञ में बुलावे ।” इसके सम्बन्ध में पाँच नीचे के श्लोक कहे जाते हैं :— याभिर्गोभिरुदमयं प्रैयमेधा अयाजयन् । द्वे द्वे सहस्रे बद्धानामात्रेयो मध्यतो ददात् ॥१॥ अष्टाशीति सहस्राणि श्वेतान् वैरोचनो हयान् । प्रष्ठीं निश्चृत्य प्रायच्छद् यजमाने पुरोहिते ॥२॥ देशाद् देशात् समोळ्हानां सर्वासामाव्य दुहितॄणां । दशाददात् सहस्राण्यात्रेयो निष्ककंठ्यः ॥३॥