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ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय

Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished592 pages

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पाँचवाँ अध्याय ] ४८९ रहता है। वह आयु से पहले नहीं मरता, बुढ़ापे तक रहता है और पूरी आयु पाता है। और वह कभी फिर न मरेगा क्योंकि वह क्षत्र से क्षत्र को प्राप्त करता है और बल से,बल को पाता है। जिसका पुरोहित ऐसा राष्ट्र का रक्षक पुरोहित है उसकी प्रजा बिना किसी प्रकार के विरोध और दलबन्दी के उस की आज्ञाओं को मानती है। (२) २६—इस विषय में ऋषि का ऐसा कथन है :— स इद् राजा प्रतिजन्यानि विश्वाशुष्मेण तस्थावभिवीर्येण। बृह- स्पतिं यः सुभृतं बिभर्ति वलगूयति वन्दते पूर्वभाजम्। (ऋ० ४।५०।७) जन्यानि का अर्थ है शत्रु। वह उनको क्षत्र और वीर्य से जीतता है। "बृहस्पतिं यः सुभृतं बिभर्ति" का अर्थ इस प्रकार बृहस्पति देवों का पुरोहित है और राजाओं के मनुष्य पुरोहित उन्हीं का अनुकरण करते हैं। "जो अच्छी तरह पोषण करने वाले बृहस्पति को पोसते हैं, " अर्थात् जो पोषण करने वाला पुरोहित है राजा उसका पोषण करता है। "वलगूयति वन्दते पूर्वभाजं" का अर्थ इस प्रकार है :— पुरोहित पूर्वभाज है क्योंकि पहला भाग उसी का है। राजा उसका सम्मान और उसको नमस्कार करता है। उसको चुनता है। स इत् क्षेति सुधित ओकसि स्वे तस्या इळा पिन्वते विश्वदानीम्। तस्मै विशः स्वयमेवा नमन्ते यस्मिन् ब्रह्मा राजनि पूर्वं एति ॥ ( ऋ० ४।५०।८ ) 'ओकस्' का अर्थ है घर। सुधित = सुहित के अर्थात् प्रसन्न। इसलिये पहले पद का अर्थ हुआ कि पुरोहित प्रसन्न होकर राजा के घर में रहता है। इडा का अर्थ है अन्न। उसको सदा अन्न मिलता है। "उसको लोग स्वयं ही नमस्कार करते हैं,