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ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय

Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished592 pages

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पाँचवाँ अध्याय ] ४९१ भूसु॑र्वः स्वः, ओ३म् । वह मैं हूँ, यह त है । तू यह है । मैं वह हूँ । तू द्यौ है, मैं पृथ्वी हूँ । तू साम है, मैं ऋक् हूँ । हम दोनों एक दूसरे को पुष्ट करें । हमको पुराने भयों से बचा ( जिनसे पुराने राजा पीड़ित हो चुके हैं ) । तू शरीर है, मेरे शरीर की रक्षा कर ॥१॥ हे सैकड़ों औषधियो, जो तुम पर सोम राज करता है तुम इस मेरी गद्दी पर मेरे लिये आनन्द दो ॥२॥ हे पृथ्वी पर विस्तृत ओषधियो, जिन तुम पर सोम राज करता है आप मेरी इस गद्दी पर मुझे सुख दो ॥३॥ मैं इस राष्ट्र में शान्ति की स्थापना करता हूँ, इसके लिये मैं दिव्य जलों की ओर देख रहा हूँ । ( पुरोहित के ) दाहिने पैर को धोकर मैं राष्ट्र में इन्द्रिय (इन्द्र की शक्ति) को स्थापित करता हूँ । बायें पैर को धोकर मैं उस इन्द्रिय की वृद्धि करता हूँ ॥४॥ हे देवो, मैं राज्य की रक्षा और अभय की प्राप्ति के लिये ( पुरोहित के ) पहले और दूसरे पगों को धोता हूँ । जिन जलों से पग धोये गये हैं वह मेरे शत्रु को भस्म करें ॥५॥ (४) २८—अब ब्रह्म-परिमर क्रिया कही जाती है । जो ब्रह्म- परिमर क्रिया को जानता है उसके सब शत्रु और वैरी मर जाते हैं । ब्रह्म है जो बहता है अर्थात् वायु । उसके चारों ओर पांच देवता मरते हैं :—विद्युत् , वृष्टि, चंद्रमा, आदित्य, अग्नि । अब पानी नहीं बरसता तो विद्युत् विद्युत् में प्रविष्ट हो जाती है और छिप जाती है । जब लोग शत्रु को न देखें तो राजा कहे, “विद्युत के मरने से मेरे शत्रु भी मर जायँगे, और छिप जायँगे । वे कभी शत्रु को न देखें ।” वह शीघ्र ही मर जाता है और वे उसको देख नहीं पाते । वृष्टि बरस कर चंद्रमा में प्रविष्ट हो जाती है और छिप जाती है । जब वह मर जाती है और अन्तर्ध्यान हो जाती है

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