ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय
Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)
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Read in contextतीसरा अध्याय सोम-क्रय, अग्नि-मथन, आतिथ्य-इष्टि १२—देवों ने राजा सोम को पूर्व दिशा में खरीदा था। इस लिये यह पूर्व दिशा में ही खरीदा जाता है। उन्होंने तेरहवें महीने से सोम खरीदा था, इसलिये तेरहवां महीना निन्दनीय है। सोम का बेचना निन्दनीय है। इसलिये सोम का बेचने वाला पापी है। जब उसको मोल लेकर मनुष्यों के पास लाये तो उसकी शक्तियां तथा इन्द्रियां सब दिशाओं में फैल गईं। उन्होंने उनको एक ऋचा के द्वारा इकट्ठा करने की चेष्टा की। परन्तु वह न कर सके। तब उन्होंने दो, तीन, चार, पांच, छः और सात मन्त्रों से यत्न किया। परन्तु वह उनको इकट्ठा न कर सके। तब आठ मन्त्रों से सफल हुये और उनको प्राप्त किया। अष्ट (आठ) को अष्ट इसलिये कहते हैं कि इससे अश्नुते अर्थात् प्राप्ति होती है। ('अष्ट' अश् धातु से बनता है जिसका अर्थ है प्राप्त करना)। जो इस रहस्य को समझता है वह जो चाहता है उसी को पा लेता है। इसीलिये इन कर्मों में आठ आठ मन्त्र होते हैं जिससे सोम की इन्द्रियां और शक्तियां इकट्ठी हो सकें। (१) ( ३८ )