ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय
Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)
Page 58 of 592
Read in context४४ [प्रथम. पञ्चिका योगक्षेम✤ न हो। प्रजा तितर बितर हो जाय। विमुक्त बैल घर में रहती हुई सन्तान का स्थानापन्न हैं और जो जुता हुआ है वह क्रियाओं का रूप है। जो एक बैल को खोल कर और एक को जुते हुये सोम को उतारता है वह दोनों प्रकार का कुशल प्राप्त करता है अर्थात् वर्तमान और भविष्य। देव और असुर इन लोकों में लड़े। वे पूर्व दिशा में लड़े। वहाँ से असुर जीत गये। वे पश्चिम दिशा में लड़े। वहाँ से असुर जीत गये। वह उत्तर दिशा में लड़े। वहाँ से भी असुर जीत गये। वह उत्तर दिशा में लड़े। वहाँ देव न हारे। यही दिशा अपराजिता है। इसलिये इसी दिशा में कार्य करे या करावे। इसी दिशा से उसके ऋण दूर हो जायेंगे। देवों ने कहा कि राजा न होने के कारण (असुर) हमको जीत लेते हैं। इसलिये एक राजा चुन लें। सब ने कहा, “अच्छा”। उन्होंने सोम राजा को चुना। उन्होंने सोम राजा की सहायता से सब दिशायें जीत लीं। यह सोम राजा ही है जो यज्ञ करता है। जब उसे (गाड़ी पर) रखते हैं तो वह पूर्वाभि- मुख होता है। इस प्रकार यजमान पूर्व दिशा को जीत लेता है। वे गाड़ी को दक्षिण को मोड़ते हैं। इस प्रकार दक्षिण दिशा को जीतते हैं। जब गाड़ी उत्तर दिशा की ओर होती है वह (सोम को) उतार लेते हैं। इससे उत्तर दिशा को जीत लेते हैं। जो इस रहस्य को जानता है वह सोम राजा की सहायता से सब दिशायें जीत लेता है। (३) ✤योग का अर्थ है कार्यपरायणता और क्षेम का अर्थ है विश्राम। जुता हुआ बैल 'योग' का प्रतिनिधि है और खुला हुआ 'क्षेम' का। —तै०,