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ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय

Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished592 pages

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४६ [ प्रथम पञ्चिका है कि सविता तो सभी उत्पत्तियों का स्वामी है। सविता की प्रेरणा से ही अग्नि मथी जाती है। इस लिये सविता का मन्त्र पढ़ा गया। अब नीचे का द्यावा-पृथिवी का मन्त्र पढ़ा जाता है :— मही ※द्यावा पृथिवी इह ज्येष्ठे रुचा भवतां शुचयद्भि॒िरर्कैः । यत् सीं वरिष्ठे बृहती विमिन्वन् रूवद्धोक्षा प्रथानेभिरेवैः । (ऋ० ४।५६।१) यहाँ प्रश्न उठता है कि जब मथी हुई अग्नि के लिये मन्त्र पढ़ना है तो द्यावा-पृथिवी के लिये क्यों पढ़ते हैं। इसका उत्तर यह है कि जब अग्नि उत्पन्न हुआ तो देवों ने उसे द्यौ और पृथिवी के बीच में ग्रहण किया और द्यावा-पृथिवी के बीच में ही पकड़े रक्खा। इस लिये द्यावा-पृथिवी का मंत्र पढ़ते हैं। अग्नि को मथते समय तीन अग्नि की ऋचाओं को जो गायत्री छन्द में पढ़ते हैं :— त्वामग्ने पुष्करादध्यथर्वा निरमन्थत। मूर्ध्नो विश्वस्य वाघतः ॥ तमु त्वा दध्यङ् ऋषिः पुत्रईंधे अथर्वणः। वृत्रहणं पुरन्दरम् ॥ तमुत्या पाथ्यो वृषा समीधे दस्युहन्तमम्। धनञ्जयं रणे रणे ॥ (ऋ० ६।१६।१३, १४, १५) इसी प्रकार वह अग्नि को उसी के देवता और उसी के छन्दों द्वारा समृद्ध करता है। “अथर्वा निरमंथत” ऐसा कहने से मंत्र रूप-समृद्ध हो जाता है। अर्थात् जो क्रिया करनी होती है यदि वही मंत्र में भी वर्णित हो तो उस मंत्र को रूप-समृद्ध कहते हैं। रूप-समृद्ध मंत्र से ही क्रिया सफल होती है। यदि अग्नि न उत्पन्न हो या देर में उत्पन्न हो तो राक्षसों को मारने वाली नीचे की ऋचायें पढ़ी जाती हैं :— ※ऐतरेय ब्राह्मण में “मही द्यौः पृथिवी चन” ऐसा पाठ है। क्या यह यही मंत्र पाठान्तर के साथ है या अन्य कोई मंत्र ? —ले०

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