ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय
Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)
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Read in contextतीसरा अध्याय ] ५१ इस कृत्य को करके होता यजमान के सिर में मानो सातों प्राणों को रखता है। स्विष्टकृत् के दो संयाज्य मन्त्र यह हैं :- होतारं चित्ररथमध्वरस्य यज्ञस्य यज्ञस्य केतुं रुशन्तम्। प्रत्यर्धि देवस्य देवस्य मह्ला श्रिया त्वग्निमतिथिं जनानाम् ॥ (ऋ० १०।९१।३) प्र प्रायमग्निर्भरतस्य शृण्वे वि यत् सूर्यो न रोचते बृहद् भाः। अभि यः पूरुं पृतनासु तस्थौ द्युतानो दैव्यो अतिथिः शुशोच ॥ (ऋ० ७।८।४) यह दोनों अतिथि सम्बन्धी ऋचायें हैं। इसलिये रूप-समृद्ध हैं। जो ऋचायें रूप समृद्ध होती हैं वे यज्ञ के लिये ठीक होती हैं। क्योंकि ऋचाओं में वही बात होती है जिसको करना होता है। यह दोनों त्रिष्टुभ् हैं इसलिये इन्द्र की शक्ति पाने के लिये ठीक हैं। यज्ञ-अवशिष्ट खाने से कृत्य समाप्त हो जाता है। देवों ने अतिथि-इष्टि के अन्त में यज्ञ शेष खाया। उसी से वह सन्तुष्ट हो गये। इसलिये इस इष्टि की अन्तिम क्रिया यज्ञ-शेष का भोग है। इस इष्टि में प्रयाज आहुतियां दी जाती हैं। अनुयाज नहीं। प्रयाज और अनुयाज दोनों ही प्राण हैं। शिर के प्राण प्रयाज हैं। जो शरीर के निचले भाग के प्राण हैं वह अनुयाज हैं। जो अनुयाज आहुतियां देना चाहे वह ऐसा ही होगा मानो बीच के प्राणों को काट कर शिर में रख दे। यह अर्थ है कि शिर के प्राण और निचले प्राण सब एक ही स्थान पर मिलें। इसलिये इस इष्टि में यदि अनुयाज न हों, केवल प्रयाज ही हों तो अनु- याज करने वाले का अभिप्राय भी सिद्ध हो ही जाता है। (६) ऐतरेय ब्राह्मण की पहली पञ्चिका का तीसरा अध्याय समाप्त।